समाज के टुकड़े मदरसा जाओ, देश के टुकड़े JNU आओ :-भारत देश में अब ये बहस बंद कर देनी जानी चाइये की इन ‘टुकड़े-टुकड़े’ गैंग या अफजल जैसे जिहादी गैंग वालो के साथ क्या करना चाइये? इन जैसो को दूध पिलाने का काम सदियों से देश की सबसे पुरानी पार्टी खान्ग्रेस कर रही है। जिसकी आड़ में न जाने कितने जहरीले सांप JNU मे पल रहे है। जो आज भी हमारे देश के प्रधानमंत्री की कब्र खोदने में तुले रहते है।
इस जैसे एक छोटे से जिहादी कट्टर सोच के सपोले की यह हिम्मत कि वह देश की रणनीतिक एकता पर “काटने” जैसी भाषा का इस्तेमाल करे, दरअसल उसकी मानसिक सोच के पीछे सालो से खान्ग्रेस का हाथ रहा है।

पाकिस्तान-बांग्लादेश ये धर्म के नाम पे लिए अब चिकन नेक भी मुसलमानो की।
ऐसे शब्द किसी जिहादी का साहस नहीं, बल्कि आज़ादी के बाद से खान्ग्रेस ने इसे ऐसे फटने वाले जिहादियों को पाला पोसा है। आज राष्ट्र की अखंडता पर ऐसे सपोले ही JNU की कैंपस से धमकी देकर देश को काटने की बात करते है। ये भी सोचने वाली बात है की ऐसे कैंपस ही उन्ही लोगो के नाम पर है जिनको विरासत में देश के टुकड़े करने का जिम्मा मिला है या टुकड़े कराने वालो का साथ देना है।
राहुल और उसकी पार्टी का समर्थन इन जिहादियों के लिए JNU तक ही नहीं बल्कि ये इनके साथ साथ देश के दुश्मन पाकिस्तान के साथ भी खड़े हो जाते है।
आज़ादी” के नाम पर टुकड़े, विरासत में मिला जहर है।
जिनको मदरसों में मौलवी होना चाइये था वो देश के JNU टुकड़े कैंपस में रिसर्चर बनके देश के टुकड़े की रीसर्च कर रहा था। इस टुकड़े रीसर्च में देश की खान्ग्रेस पार्टी इनके लिए लैब का काम कर रही है।
इतिहास गवाह है की देश के हर टुकड़े में इस पार्टी का हाथ रहा है। यहाँ तह इमरजेंसी लगा के सविंधान के भी टुकड़े किये थे इस पार्टी की घमंडी तानाशाह ने।
हम अगर आज भी ये सोचते ही हम इन जैसे टुकड़े गैंग वाले लोगो के साथ भाईचारे वाला रिश्ता निभाते है तो हमे अपने देश के दोनों तरफ अपना चारा बनते हुए देख लेना चाइये।
कांग्रेस,और ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ के लिए JNU देश विरोध का नंगा मंच :-
जो फटने के लिए बने हों, उन्हें पढ़ाई हमेशा गैर-ज़रूरी लगती है। क्योंकि ज्ञान जोड़ना सिखाता है। ज्ञान और जोड़ना इन जिहादियों का दोनों से ही कोई वास्ता नहीं है। जिनको बचपन से ही भारत माँ से नफरत और गजवाहिंद से प्यार हो तो ऐसे सपोले बस JNU में टुकड़े करने की ही रीसर्च करेंगे।
गजवाहिंद सिर्फ़ एक शब्द नहीं, बल्कि उस मानसिकता का प्रतीक है जो शोर को शक्ति और भ्रम को बहस समझ लेती है। जहाँ तर्क असहज हो जाए, वहाँ उकसावे का सहारा लिया जाता है; जहाँ तथ्य बोझ बनें, वहाँ नारे हल्के लगते हैं। यह सोच सवालों से भागती है, क्योंकि सवाल जवाब माँगते हैं—और जवाब देने के लिए ईमानदार अध्ययन चाहिए। लोकतंत्र में असहमति सम्मान से चलती है, मगर गजवाहिंद वाली प्रवृत्ति हर असहमति को टकराव में बदल देती है। नतीजा यह कि समाधान पीछे छूट जाते हैं और विवाद आगे बढ़ते हैं।
