किसी को भी इस देश को “काटने” या तोड़ने की बात करने का कोई जायज़ आधार नहीं हो सकता। पर हमारे देश में एक ऐसा विशेष दर्जा प्राप्त जिहादियों का टुकड़े गैंग है। जो इस देश को शांत देख ही नहीं सकते।
दिल्ली में दंगे करवाने हो और उसमे हिन्दुओं को निशाना बनाना या देश को किसी भी हिस्से से अलग करने की बात हो। ये जिहादी इसी देश के संस्थानों का खून पीते है और जब ये डसने के लायक हो जाते है तो सपोलो के मालिक इस देश को डसने के लिए इनको खुला छोड़ देते है।

कहाँ से आते है ऐसे जिहादी ? यह सवाल किसी धर्म, जन्म या पहचान पर है या नहीं है इसपे हम जाना नहीं चाहते –पर एक कट्टर सोच और ऐसी मानसिकता हमारे समाज में ही आस पास पनपती है। मदरसा एक ऐसा मुख्यालय जहां उम्र खालिद जैसे ही पैदा होते है।
यह भी याद रखना चाहिए कि कट्टरता सीखी जाती है—वह न तो जन्मजात होती है, हम देश वाशियो के ये पता होना चाइये की ऐसी कट्टरता कहा से आती है। “अगर आज भी किसी सेक्युलर हिंदू को कट्टरता समझनी है, तो इनके नैरेटिव के पड़ोस में बसकर देख लो।”
“Zohran Mamdani” Newyork नगर पालिका कर्मचारी :- USA मदरसा छाप एक नगर पालिका पार्षद जिसका काम अपने सहर की साफ़ सफाई का है पर इसको भारत के उम्र खालिद जैसी गन्दगी में कुछ ज्यादा ही रूचि दिख रही है। इसका सबसे बड़ा कारण है। इसका विशेष समुदाय जो इसको सदियों से तैयार कर रहा है ऐसे मामलो में खुद को फिदाइन बना देना। ऐसे मामलों में खुद को “फिदाइन” बना लेना सिर्फ़ कट्टर सोच की चरम अवस्था है।
आत्म-विनाश चुनने वाले सिर्फ़ यह साबित करते हैं कि उनके पास न भविष्य की सोच है, न इंसानियत की समझ—बस एक खोखली ज़िद, जो खुद को और दूसरों को राख में बदल देती है।
Umar khalid “चिकन नेक जिहादी” कम था ? इम्पोर्टर जिहादी Zohran Mamdani को बुलाना पड़ा ? भारत में असहमति और आलोचना इन जिहादियों की रीढ़ हैं। पर जब इन जिहादियों के समर्थन में विदेशी मंचों से गढ़े गए इम्पोर्टर जिहादी को बुलाना पड़े। तो हम आवाज भी न उठाये।
Zohran Mamdani का इस मुद्दे के बीच में कूदना ये बताता है की इन्हे बस इन्हे इनका जिहाद वाला मकसद एक कर देता है।
Umar khalid “PHD रिसर्चर जिहादी”:- “डिग्री पीएचडी की हो सकती है, पर लोकतंत्र में काटना और सर तन से जुदा कर देना तो इन जैसो की प्रारंभिक शिक्षा होती है। और ऐसा कुछ बस भारत ने ही नहीं देखा है बल्कि इन जैसे जिहादियों ने जहा से भी शिक्षा ली है ये वही फट गए है।
2014 से पहले इन जैसो के लिए भारत 72 हूरो को पाने का सबसे आसान रास्ता था। और इस रास्ते में फूल बिछाने के काम को पप्पू की पार्टी पूरा समर्थन करती थी।
निष्कर्ष:
देश से सवाल पूछना गलत नहीं; सवालों को विभाजन का औज़ार बनाना गलत है। ‘देशभक्त’ कहलाने का हक़ नाम से नहीं, काम से मिलता है—और काम तब सार्थक होता है जब वह देश को जोड़ता है, टुकड़ों में नहीं बाँटता।
