“जिहाद के प्रकार समझते-समझते, कलयुग बीत जाएगा।”
यह सिर्फ़ एक शब्द नहीं, बल्कि ये वो भयावह वाक्य है जिससे पूरा विश्व सुनने के बाद सहम जाता है, यह ताक़त हथियारों से नहीं, सोच के ज़हर से बनती है।
न इसकी कोई स्थायी शक्ल है, न एक चेहरा—फिर भी यह हर दरवाज़े से भीतर घुसने की काबिलियत रखता है। शब्दों में लिपटकर, भावनाओं को भड़काकर और भ्रम फैलाकर यह समाज की नसों में उतरता है। इसे रोकना मुश्किल इसलिए नहीं कि यह दिखता नहीं, बल्कि इसलिए कि यह हर बार नए नाम, नए तर्क और नए आवरण में सामने आ जाता है।
जिहाद के कई रूप: लव जिहाद।
जिहादी सोच की आग में सबसे पहले देश के साथ साथ सनातन जलता है। केरल से जन्मा ये शब्द अब पुरे भारत में पैर पसार चूका है। मुद्दा अब पहचान का ही है, बल्कि उस सोच और तरीक़ों का है जो धोखे, दबाव और झूठी पहचान के सहारे भरोसे को तोड़ते हैं। बेटियों को डर में नहीं, जानकारी और आत्मनिर्भरता में बड़ा करना होगा—ताकि वे जिहाद और मुगलीकरण का फ़र्क़ समझ सकें।
अगर आप ऐसे जिहाद एंगेल्स के बीच में रहते है, तो आज की दुनिया में शिक्षा के साथ साथ अपनी बेटियों को ख़तरे की स्थिति में खुद को इन मदरसा छाप वालो से सुरक्षित रखना जरूर सिखाये।

“जमीन जिहाद”
यह शब्द उन आशंकाओं की ओर इशारा करता है, जहां जिहादियों के पास 50 से भी ज्यादा देश है, लेकिन ज़मीन पर कब्ज़ा, फ़र्ज़ी दस्तावेज़, ट्रस्ट या बेनामी लेन-देन जैसे तरीक़ों से धीरे-धीरे भारत पे जमीन जिहाद करके कब्ज़ा करने की साजिश करते रहते है।
देश ने सबसे पहला जमीन जिहाद आज़ादी के वक़्त देखा था, जिसको जिन्ना नाम के जिहादी ने अंजाम दिया था और देश को तीन टुकड़े में काट दिया था।
देश के युवा को आज उस दौर को समझने की ज़रूरत इसलिए है, ताकि भविष्य में भी ऐसी ही विचारधारा के नाम पर ज़मीन, समाज और इंसानियत की क़ीमत दोबारा न चुकानी पड़े।
“वोट जिहाद”

सरकार की हर सुविधा भर-भर कर लेना, लेकिन वोट देने की ज़िम्मेदारी से बचना—और बाद में उसी सरकार को बुरा भला बोलना ही वोट जिहाद कहलाता है
लोकतंत्र में अधिकार और कर्तव्य साथ-साथ चलते हैं। अगर योजनाएँ चाहिए, सुरक्षा चाहिए, सड़क-पानी-बिजली चाहिए—तो फिर निर्णय की घड़ी में चुप्पी क्यों? वोट न देना निष्पक्षता नहीं, व्यवस्था को कमज़ोर करना है। जो लोग लाभ तो लेते हैं, पर जवाबदेही से पीछे हटते हैं, वे अनजाने में उसी सिस्टम को खोखला करते हैं जिससे उन्हें फायदा मिलता है। बदलाव नारों से नहीं, मतदान से आता है—और इस सच्चाई से भागना लोकतंत्र के साथ सबसे बड़ा अन्याय है।
“थूक जिहाद’

थूक जिहाद’ जैसे शब्द उन कथित घटनाओं की ओर इशारा करते हैं, जहाँ सार्वजनिक स्वास्थ्य और स्वच्छता के साथ खिलवाड़ करने के आरोप लगाए जाते हैं।
अगर कोई व्यक्ति जानबूझकर सनातन के द्वेष में भोजन, सार्वजनिक स्थान या लोगों की सुरक्षा से जुड़ी चीज़ों को थूक से दूषित करना ही थूक जिहाद है।
ऐसे कृत्यों को इनके यहाँ मौलवी इनके दिमाग में बचपन से ही जिहाद के रूप में भर देते है।
देश की हालत अब ये हो गयी है की आप बिना पढ़े कही भी कुछ नहीं खा सकते।
“हमारी कितनी किस्में हैं—ये आपको आगे बताते रहेंगे।”
