नायिकाएँ हरम में और नायक इस्लामिक झुकाओ में। 90’s के दौर आप कह सकते हो की इस पे इस्लामिक कब्ज़ा था। क्योकि हमने सुना था की इस इंडस्ट्री को चलने वाला पाकिस्तान में बैठा बॉलीवुड का डॉन दाऊद था।
90’s के दौर में भी हमने देखा की वो समुदाय अपने फर्ज पे अडिग था। “सेक्युलर लम्बू और टिन्गूयों को मौन रहना था—क्योंकि जिस वक़्त विवेक बोलने की ज़रूरत थी, उस वक़्त उनकी आवाज़ें दरगाओ में अर्जी लगा रही थीं। हमेशा से ही सेक्युलर हिन्दुओं ने मुगलो से दोस्ती पे छाती ठोकी है बेशक वो दाऊद से क्यों न हो।
आज़ादी के बाद से ही भारतीय सिनेमा में इस्लामीकरण का खिंचाव लगातार दिखता रहा है। देश की संस्कृति के चयन से लेकर राष्ट्र नायकों की छवि तक। सवाल धर्म का ही है , दृष्टि का नहीं: जब सनातनी परंपरा को पिछड़ा और उनकी जातियों को अलग अलग रूप में दिखाना क्या इसे हम भारतीय सिनेमा कहेंगे? और वही दूसरी तरफ जिन्होने कभी मदरसों के आलावा कोई शिक्षा संस्थान न देखा हो ऐसे खास फ्रेम को प्रगतिशील बताने की होड़ लग जाए, तब भारतीय सिनेमा नहीं जिहादी सिनेमा की सोच भी कह सकते है।
“Love jihad का पेज थ्री प्लेटफार्म जहां love jihad की बहस दब जाती है।”
आज जब भी love jihad पर गंभीर बहस उठती है, वह जल्दी ही पेज-थ्री की चमक में खो जाती है। मुद्दा बदल जाता है—कभी किसी सेलेब की डेटिंग, कभी ब्रेक-अप, कभी वायरल तस्वीर। सवाल वही रहता है, पर फ़ोकस शिफ्ट हो जाता है। यही पेज-थ्री का असली काम है—बहस को डायल्यूट करना।
उसी लव जिहाद से निकली नस्लों के नाम भी मुगल अक्रान्ताओ के नाम पर लिख दिए जाते है।
“हिंदू संस्कृति को नीचा दिखाकर कमाया गया पैसा आखिर क़ब्र के किस काम का?”
👉“कला बनाम कलमा”?
आज के दौर में पैसा सब कुछ नहीं, पैसे का रास्ता सब कुछ है। अगर कमाई अपनी ही जड़ों को नीचा दिखाकर हो—तो वह सफलता नहीं, शॉर्टकट है। ट्रेंड बन सकता है, ट्रस्ट नहीं। व्यूज़ आ सकते हैं, विरासत नहीं। ईमानदार मेहनत से आया पैसा चुप रहता है—वो खुद बोलता है। लेकिन नकारात्मकता से आई कमाई को खुद को सही ठहराने के लिए शोर चाहिए। सवाल उठता है: जो पैसा पहचान को चोट पहुँचाकर आया, वह आत्मसम्मान कैसे देगा?
👉सनातन के अपमान को ‘आर्ट’ कहने की सुविधा।
कला सवाल पूछे—ज़रूरी है।
लेकिन जब हर कहानी में एक ही संस्कृति को निशाना बनाया जाए, हर प्रतीक को मज़ाक में बदला जाए, और हर परंपरा को ‘बोझ’ बताया जाए—तो यह कला नहीं, कैल्कुलेटेड कंटेंट बन जाता है।
Gen-Z इसे पहचानता है: यह क्रिटिसिज़्म नहीं, क्लिक-फार्मिंग है।
👉 दाऊलीवुड में चुप्पी भी कुछ सेक्युलर हिन्दू परिवारों की कायरता का प्रदर्शन है।
