“हिन्दू सम्राट Bal Thackeray की महान विरासत पर Uddhav Thackeray जैसा जयचंद सबसे बड़ा कलंक और अभिशाप”-आज के चुनाव परिणामों ने यह पूरी तरह साफ कर दिया कि Bal Thackeray की सिंह-सी, गर्जन करती विरासत को Uddhav Thackeray जैसे जयचंद ने सिर्फ छोड़ा ही नहीं, बल्कि गद्दारी की राजनीति से रौंद डाला। जिस विरासत की नींव हिंदुत्व, स्वाभिमान और सड़क से सत्ता तक के संघर्ष पर टिकी थी, उसे सत्ता की सनक और कुर्सी की भूख ने खोखला कर दिया। आज का जनादेश कोई साधारण हार नहीं है, यह उस विश्वास का अंतिम फैसला है जिसे बाला साहेब ने हिंदुओं के दिलों में बोया था और जिसे उनके ही बेटे ने सौदेबाज़ी की मेज़ पर गिरवी रख दिया। चुनाव ने बता दिया कि जनता विरासत के नाम पर धोखा नहीं स्वीकार करती। शेर की दहाड़ की जगह जब समझौते की फुसफुसाहट आ जाए, तो इतिहास माफ नहीं करता। आज यह हार नहीं, बल्कि उस गद्दारी की सार्वजनिक चिता है, जिसने एक महान विरासत को राजनीतिक मज़ाक बना दिया।
“जिस दिन Bal Thackeray की पार्टी में ‘सोनिया ज़िंदाबाद’ गूंजा, उसी दिन हार तय हो गई”
तेरे जैसे को गोद में लेकर हिंदुओं के लिए लड़े थे, खून-पसीना बहाया था, ताकि आने वाली पीढ़ी सिर उठाकर जी सके। लेकिन तू उसी गोद का कर्ज़ गद्दारी से चुकाने लगा। जिनके हक़ के लिए संघर्ष हुआ, उन्हीं हिंदुओं की पीठ में छुरा घोंप दिया। यह भूल मत कि इतिहास सब देखता है—जो अपनों के भरोसे को तोड़ता है, वह न कभी माफ़ होता है, न सम्मान पाता है।

“जब विचार ही नहीं बचे, तो ठाकरे और मराठी होने का दावा कैसा?”-अब वक्त सच स्वीकार करने का है—खुद को ठाकरे और हिन्दू मराठी कहना छोड़ दो, क्योंकि यह पहचान अब कर्मों से नहीं, केवल नाम की ढाल बनकर रह गई है। ठाकरे होना केवल उपनाम नहीं, बल्कि स्वाभिमान, स्पष्टता और मराठी–हिंदू अस्मिता के लिए अडिग खड़े रहने की शपथ होती है। लेकिन जब फैसले डर से, गठबंधन सौदेबाज़ी से और राजनीति आत्मसम्मान की कीमत पर की जाए, तो यह पहचान खोखली हो जाती है। हिन्दू मराठी समाज ने आज के चुनाव में साफ संकेत दे दिया है कि वह इतिहास और विरासत के नाम पर छल को स्वीकार नहीं करेगा। जो नेतृत्व अपनी जड़ों से कट जाए, वह न मराठी अस्मिता का प्रतिनिधि रह सकता है, न हिन्दू चेतना का। यह पराजय केवल सत्ता की नहीं, बल्कि उस नैतिक अधिकार की भी है, जिसके दम पर खुद को ठाकरे और हिन्दू मराठी कहा जाता था। अब यह नाम छोड़ना अपमान नहीं, बल्कि सच का सामना करने की पहली ईमानदार शुरुआत है।
“Raj Thackeray ने देश को साउथ–नॉर्थ में तोड़ने की कोशिश की, आज खुद हमेशा के लिए टूट गया”-“जो देश तोड़े, वही अंत में बिखर गया”-जिस राजनीति की नींव देश को साउथ–नॉर्थ में बाँटने पर रखी गई हो, उसका अंजाम टूटन ही होता है—और यही आज Raj Thackeray की सच्चाई बनकर सामने आया है। भाषा, क्षेत्र और पहचान की आग भड़काकर जिस सियासत को ज़िंदा रखने की कोशिश की गई, वह अंततः उसी आग में जल गई। जनता अब इस तरह की विभाजनकारी राजनीति को समझ चुकी है; उसे रोज़गार, स्थिरता और सम्मान चाहिए, न कि नक्शे पर खींची गई नई दीवारें। जब नेता मुद्दों से भागकर समाज को टुकड़ों में बाँटने लगते हैं, तब जनादेश उन्हें आईना दिखा देता है। आज की यह स्थिति कोई अचानक आई हार नहीं, बल्कि वर्षों से बोए गए विभाजन के बीजों का स्वाभाविक परिणाम है—जो देश को तोड़ने निकलते हैं, इतिहास अंत में उन्हें ही बिखरा हुआ छोड़ देता है।
