देश के बँटवारे में कांग्रेस और नेहरू की भूमिका पर टुकड़े गैंग वाली चुप्पी।
आज जब देश के बँटवारे पर मिनी पप्पू द्वारा ज्ञान दिया जाता है, तो हैरानी होती है कि कुछ ऐसे जैचंद है जिन लोगों को इसमें Indian National Congress और Jawaharlal Nehru की कोई भूमिका नज़र नहीं आती।
जबकि देश के टुकड़े कराने में कांग्रेस पार्टी ने कोई कसर नहीं छोड़ी और आज भी अपने देश के टुकड़े वाले मकसद के लिए देश विदेश की यात्राओं में उसी कांग्रेस की नयी पीढ़ी का जिन्नाह देश को बरबाद कर रहा है।
नेहरू और जिन्नाह ने बँटवारे को अचानक नहीं, बल्कि सुनियोजित राजनीतिक रणनीति के तहत आगे बढ़ाया। उन्होंने धर्म को राजनीति का औज़ार बनाकर Two-Nation Theory को आक्रामक रूप से प्रचारित किया, और कटरपंथियो को मिले दो देश और भारत बन गया धरमशाला।
कांग्रेस और ब्रिटिश एक ही सिक्के के दो पहलू।
कांग्रेस और ब्रिटिश की रणनीति में डेडलॉक पैदा करना, सामुदायिक ध्रुवीकरण बढ़ाना और अंततः हिंसा के भय को सौदेबाज़ी के हथियार की तरह इस्तेमाल करना शामिल था। “Direct Action Day” जैसे कदमों ने माहौल को विस्फोटक बनाया, ताकि विभाजन को एकमात्र समाधान के रूप में पेश किया जा सके। यह राजनीतिक चतुराई नहीं, बल्कि देश को तोड़कर सत्ता हासिल करने की ठंडी गणना थी—जिसकी कीमत करोड़ों लोगों ने विस्थापन, हिंसा और स्थायी विभाजन के रूप में चुकाई।
इतिहास बताता है—टकराव नहीं, मिलीभगत ने देश को तोड़ा।
बँटवारे पर भी अपने भारतीय लेखक नहीं, विदेशी लेखकों की किताबें पढ़कर ज्ञान बाँटा जा रहा है।
B. R. Ambedkar ने कांग्रेस पर सीधे-सीधे आरोप नहीं, बल्कि तर्क, दस्तावेज़ और राजनीतिक व्यवहार के आधार पर कई गंभीर सवाल उठाए हैं। मुख्य बिंदु संक्षेप में:
- कांग्रेस का विरोधाभासी रुख- अंबेडकर बताते हैं कि कांग्रेस सार्वजनिक रूप से एकता की बात करती रही, लेकिन व्यावहारिक राजनीति में उसने ऐसे कदम उठाए जिनसे विभाजन की दिशा मज़बूत हुई।
- मुस्लिम लीग को वैकल्पिक राजनीति न दे पाना- कांग्रेस मुस्लिम जनता को एक साझा, भरोसेमंद राजनीतिक विकल्प देने में असफल रही, जिससे लीग का प्रभाव बढ़ा।
- संघवाद के प्रति अविश्वास- अंबेडकर लिखते हैं कि कांग्रेस नेतृत्व को प्रांतीय स्वायत्तता पर भरोसा नहीं था, जबकि भारत जैसे विविध देश में यही विभाजन रोकने का एक रास्ता हो सकता था।
- विभाजन को ‘कम बुराई’ मानने की स्वीकृति- पुस्तक में अंबेडकर यह दिखाते हैं कि अंततः कांग्रेस नेतृत्व ने विभाजन को टालने के बजाय उसे स्वीकार करना बेहतर समझा।
- हिंसा के दबाव में निर्णय- बढ़ती साम्प्रदायिक हिंसा के बीच कांग्रेस ने दीर्घकालिक संघीय समाधान के बजाय त्वरित सत्ता हस्तांतरण को प्राथमिकता दी।
The Partition of India में Rajendra Prasad ने कांग्रेस पर परोक्ष नहीं, बल्कि कई जगह सीधे और स्पष्ट आरोप लगाए हैं।
- अखंड भारत केवल नारा बनकर रह गया।
- नेहरू और शीर्ष नेतृत्व में बटवारे की जल्दबाज़ी दिखी।
- सत्ता हस्तांतरण को देश से भी सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई।
- हिंसा के संकेत पहले ही दिख रहे थे।
- देश को भारी कीमत चुकानी पड़ी–यही कांग्रेस की सबसे बड़ी जवाबदेही थी।
