Dhruv Rathee "Mini Pappu"

Dhruv Rathee “Mini Pappu” on Aravalli Zero ground knowledge:-अरावली टूटे या बचे पर टुकड़े गैंग काम पर।

अरावली की ऊँचाई समझाई जा रही है—पर नमक-हरामी की गहराई नहीं बताई जा रही। आज बहस का स्तर देखिए—अरावली की ऊँचाई पर घंटों ज्ञान दिया जा रहा है, मीटर, नक़्शे, आँकड़े, स्लाइड्स…लेकिन एक सवाल जानबूझकर गायब है—जो इस देश की ज़मीन खाकर उसी ज़मीन को खोखला कर रहे हैं, उनकी नमक हरामी की गहराई कौन नापेगा?
मुद्दा अरावली कितनी ऊँची है, ये नहीं है। मुद्दा ये है कि इसको जर्मनी में बैठे हुए देश की शाख को नीचे ले जाना है।

अरावली बचाने का शोर, असल मक़सद टुकड़े गैंग को जिन्दा रखना :- जर्मनी के छोटे पप्पू को वहां पर बैठे हुए यहाँ अरावली में घोटाले दिख रहे है। भू माफिया नज़र आ रहे है। मिनी पप्पू के अनुसार भारत सरकार पूरी तरह से अरावली को ख़तम करना देना चाहती है। न जाने कितने प्रोगेण्डा वाली झूटी इमेज दिखाता है। अपनी इस झूटी वीडियो में इसने फिर से रामदेव बाबा और उनके सहयोगी पे ऊँगली उठाई है। इससे ये सब साफ़ हो जाता है कि इनको भगवा और देश के प्रति जहर उगलने में अरावली जैसे ठंडक मिलती है।

पाखंडी छोटे पप्पू ने ठाना है अरावली और टुकड़े गैंग को बचाना है। अरावली टूटेगी तो नुकसान किसी जर्मनी को नहीं होगा। हवा, पानी और ज़मीन का बिल भारत ही भरेगा। देश का सौदा तो इन जैसे जिहादी माइंड सेट वाले सदियों से कर ही रहे है अब इन गिद्धों के लिए अरावली एक मृत शरीर है। जिसको ये लोग चोंच मार मार के जिन्दा रखेंगे।
अरावली को बचाना है तो इन अर्बन नक्सल के हाथों से बचानी होगी। वरना यह शव-उत्सव चलता रहेगा—और हम सब दर्शक बने रहेंगे।

अपनी वीडियो में फ़र्ज़ी तस्वीरें दिखाना—मदरसा छाप ज्ञानी। मिनी पप्पू का ज्ञान मदरसा छाप, नैरेटिव टुकड़े गैंग का बेचा जा रहा है। फिर जिहादी मानसिकता के हिसाब से तस्वीरें जोड़ी जाती हैं। संदर्भ बदला, तारीख बदली, जगह बदली—लेकिन फ्रेम टुडे गैंग वाला ही रहता है।
ये और इसके टुकड़े गैंग वालो के लिए यहाँ “ज्ञानी” होने का मतलब तथ्य जानना नहीं, बस देश को कटघरे में खींच लो।

अरावली घिस सकती है, पर नमक-हरामी नहीं। पहाड़ घिसते हैं—हज़ारों साल में,हवा से, पानी से, और इंसान की लालच भरी मशीनों से। लेकिन कुछ चीज़ें ऐसी होती हैं जो कभी नहीं घिसतीं—नमक-हरामी।
टुकड़े गैंग की खासियत यही होती है—ये समय के साथ नहीं बदलती, बल्कि मौके के साथ रंग बदलती है। आज पर्यावरण की बात,कल रियल-एस्टेट की डील,परसों विदेशी तालियाँ।

Gen-Z अब पैटर्न समझ चूका है। लेकिन कैमरे के सामने ये सवाल असहज हैं, क्योंकि यहाँ जवाब देना पड़ता है।
इसलिए ऊँचाई पर बात करो,गहराई से बचो। क्योंकि गहराई में सच है—और सच अक्सर एजेंडा बिगाड़ देता है।
अरावली की हाइट समझाने वाले बहुत हैं—पर देश के साथ खड़े कौन हैं,ये बताने वाले गिने-चुने।

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