Dhruv rathee

Dhruv Rathee:-क्रांति नहीं, ये सिर्फ़ टुकड़े गैंग का मुखौटा है

Dhruv Rathee:-क्रांति नहीं, ये सिर्फ़ टुकड़े गैंग का मुखौटा है

Dhruv Rathee का नया वीडियो इलेक्टोरल बाॅन्ड पर

जब किसी देश में लोग खुद को क्रांतिकारी बनने की कोशिश करते हैं, बिना यह समझे कि ऐसे रास्ते नक्सलवाद जैसी सोच को जन्म देते हैं, तब परिणाम खतरनाक होते हैं। भारत जैसे देश में ऐसे लोगों की कमी नहीं है। ये लोग न तो ज़मीनी हकीकत समझते हैं और न ही अपने विचारों के दूरगामी असर को।

अक्सर ये लोग किसी ठोस सिद्धांत पर नहीं, बल्कि अपने “मसीहाओं” के इशारों का इंतज़ार करते रहते हैं—मसीहा जो समय-समय पर बदलते रहते हैं। विचार नहीं बदलते, सिर्फ़ चेहरे बदल जाते हैं।

और हकीकत यह भी है कि राजनीति और विचारधाराओं की समझ समय और अनुभव से आती है। जब अनुभव की कमी हो, तो जोश आसानी से ग़लत दिशा में मोड़ा जा सकता है। बिना समझ के क्रांति का नारा लगाना बदलाव नहीं, बल्कि अराजकता की ओर पहला क़दम होता है।

भारत को क्रांति के नाम पर भ्रम नहीं, समझदारी और ज़िम्मेदारी की ज़रूरत है।

भारत की विविधता और प्रगति को नज़रअंदाज़ कर सिर्फ़ नकारात्मक तस्वीर परोसी जाती है।
यह बहस नहीं, ब्रांडिंग बनती जा रही है।

Dhruv Rathee:-बदलाव Germany से नहीं आता है:-

इन्हें तो शायद यह भी पता नहीं होगा कि इनके कई रिश्तेदार जंगलों में पकड़े जा रहे हैं।कई लोगों ने तो आत्मसमर्पण भी कर दिया है, और जिन्होंने नहीं किया, उन्हें जर्मनी तक भेज दिया गया।छत्तीसगढ़ और झारखंड जैसे क्षेत्रों में सालों से इनके साथी और भाई-बंधु हिंसा और खूनी संघर्ष में शामिल रहे हैं। लेकिन ये खुद अपने परिवार और रिश्तेदारों के बारे में कभी कुछ बोलते नहीं।

यह क्रांति नहीं—यह विश्वासघात है।
अगर वास्तव में किसी को लगता है कि इस देश में क्रांति की ज़रूरत है, तो उसे भारत में रहकर, देश की ज़मीन पर रहकर बदलाव की शुरुआत करनी चाहिए। विदेश में बैठकर दिए गए भाषण और बयान क्रांति नहीं कहलाते।

असली क्रांति देश और जनता को जोड़ती है, भरोसा बनाती है और समाधान की दिशा दिखाती है। लेकिन इस तथाकथित क्रांति में जोड़ नहीं, बल्कि धोखा नज़र आता है।

सच्चाई के नाम पर चलाई जा रही यह कथित क्रांति अपने ही देश को वह नुकसान पहुँचा रही है, जिसकी गंभीरता को समझने की परिपक्वता अभी इनमें नहीं दिखती। क्रांति का अर्थ विनाश नहीं, निर्माण होता है—और जो निर्माण न करे, वह क्रांति नहीं हो सकती।

                                                           Dhruv Rathee Takes Down His AI Video On ...

भारत को बदनाम कीजिए और यूरो कमाइए।
अगर आप भारत के भीतर रहकर अपने ही देश को गाली देते हैं, तब भी आप इसी परिवार का हिस्सा हैं; और अगर भारत से बाहर बैठकर यही काम करते हैं, तब भी आप उसी परिवार से आते हैं। फर्क सिर्फ़ जगह का है, नीयत का नहीं।

Gen Z सवाल पूछती है—क्या देश को बदनाम करने के बदले इधर वालों से भी यूरो मिलते हैं, या यहाँ काम रुपये में ही चल रहा है?
सलाह भी अजीब है—यूरो में क्या रखा है, आइए यहाँ देश को बदनाम कीजिए और अपने आप को संसद तक भिजवा दीजिए, क्योंकि वे तो खुद वहाँ बैठे हैं। फिर क्या फर्क पड़ता है—यूरो हो या डॉलर।

Gen Z अब फर्क समझ रही है—आलोचना और एजेंडा अलग होते हैं।
भारत को बदनाम करना कारोबार बन गया है, लेकिन सच और जिम्मेदारी आज भी ज़रूरी हैं।

झूठी विचारधारा, असली तबाही:- झूठी विचारधारा लोगों को सपने दिखाती है, लेकिन पीछे सिर्फ़ तबाही छोड़ जाती है।यह बदलाव का वादा करती है, पर समाज को डर और विभाजन में धकेल देती है।
सच को आधा दिखाकर भावनाएँ भड़काई जाती हैं और हिंसा को正 ठहराया जाता है।जहाँ तर्क होना चाहिए, वहाँ नारे थमा दिए जाते हैं।यह सोच युवाओं को भविष्य नहीं देती, उन्हें मोहरा बना देती है।
विकास की राह रोककर इसे संघर्ष की जीत बताया जाता है।संवाद की जगह टकराव और समाधान की जगह अराजकता पैदा होती है।
झूठी विचारधारा सवालों से भागती है और असहमति को दुश्मनी बना देती है।इसके नाम पर स्कूल बंद होते हैं, रोज़गार भागता है और भरोसा टूटता है।
यह खुद को क्रांति कहती है, लेकिन परिणाम हमेशा बर्बादी होते हैं।
समाज आगे बढ़ता है समझ से, भ्रम से नहीं।
असली बदलाव जिम्मेदारी से आता है, भ्रम फैलाने से नहीं।
झूठी विचारधारा चमकदार लग सकती है, पर उसकी क़ीमत हमेशा देश और जनता चुकाते हैं।

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