Chandrashekhar_Azad_Ravan

Chandrashekhar kalyugi ravan, Anti-Ram or Anti-Unity:-“रावण आया मतलब—राम विरोध या जाति तोड़।”

कलयुगी रावण, टुकड़े गैंग जैसी सोच वाला रावण।
भारत में आज राजनीति का सबसे खतरनाक चेहरा रावण जो जातियों को तोड़ तोड़ के उसके सहारे अपना वोट बैंक खड़ा करता है। ये वो कलयुगी रावण है जिसने आज तक सनातन या देश जोड़ने की बात नहीं की होगी। इस जैसे राजनेता को अपना करियर ज्यादा जरूरी लगता है देश के करियर से और फिर ऐसे रावण उस मुकाम तक गिर सकते है जहा ये कालनेमि बन के सनातन की पीठ पे जातियों के नाम पे चुरा चलाते है।
जब सपने बड़े हो और खुद कोई काबिलियत न हो तो देश को ही ऐसे लोगो का बोझ उठाना पड़ता है।
कैसा रावण है ये आज तक मुगलीकरण, जिहाद और टुकड़े गैंग के बारे मुँह से उफ़ तक नहीं निकलती है, जबकि बताया ये जाता है की इसके दस सर है।

“कलियुग का नक़ली रावण—एक जाति से उगे, बाक़ियों को बाँटे।”
कलियुग में रावण का रूप बदल गया है। अब वह तलवार लेकर नहीं आता, बल्कि जातियोंअगर ऐसा नक़ली रावण किसी एक जाति के नाम पर खड़ा हो जाए, तो उसका मक़सद सुधार नहीं बल्कि बाक़ी जातियों को अपने एजेंडे में उलझाकर आपस में भिड़ाना होता है। की राजनीति के ज़रिये समाज में ज़हर घोलता है।
जाति से ऊपर उठकर सत्य, संवाद और एकजुटता को चुनना; क्योंकि कलियुग के इस नक़ली रावण की सबसे बड़ी हार, समाज की एकता ही है।

“कलयुगी रावण बदला है क्या, या जिहादी एजेंडा अपना लिया?”


आज का कलयुगी रावण रूप-रंग में नहीं, रणनीति में बदला हुआ दिखता है। उसके हाथ में शस्त्र नहीं, शब्दों का ज़हर है; उसके लक्ष्य में युद्ध नहीं, समाज की अखंडता है।यही कारण है कि सवाल उठता है—क्या यह सिर्फ़ सत्ता की भूख है, या फिर वही जिहादी पैटर्न, जिसमें समाज को पहचान के टुकड़ों में बाँटकर कमजोर किया जाता है?
इस रावण को क्या शुक्राचार्य की औलादे नज़र नहीं आती जिनके साथ मिलकर पर्दे के पीछे से टुकड़े टुकड़े खेला जाता है। इस देश ने ये पर्दे वाला खेल जिसमें सनातन समाज की पहचान को टुकड़ों में बाँटकर कमजोर किया जाता है।
जो राजनीति एकता से डरती है, वही सबसे पहले फूट का एजेंडा अपनाती है—और यही कलयुगी रावण की असली पहचान बन जाती है।

“सनातन की जीत से दलितों को दूर रखने की कोशिश।”
इस देश में सनातन जब जीतता है तो ये कलयुगी रावण इसको धर्म की अंधी कहकर हमारे दलितों भाइयो को उस विजय से वंचित करता है। जिस देश में ऐसे बेरोजगार रावण अगर अपने भविष्य के लिए दलित भाइयो का सहारा लेकर अगर अपनी किस्मत चमका रहे है।
यह रावण दलितों के दर्द की बात करता है, लेकिन समाधान नहीं देता; अधिकारों की भाषा बोलता है, पर विभाजन की राजनीति करता है। शिक्षा, रोज़गार और सम्मान जैसे वास्तविक मुद्दों से ध्यान हटाकर वह दलित समाज को सनातन से डराने की कोशिश करता है, ताकि वे उस साझा जीत का हिस्सा न बन सकें। यह रणनीति न दलितों का भला करती है, न देश का। क्योंकि सनातन की आत्मा समरसता, समानता और करुणा है—वह किसी को बाहर नहीं करती।

सच यह है कि जो सनातन को दलितों से अलग दिखाता है, वह दलितों की ताकत से डरता है। और जो एकता से डरता है, वही सबसे ज़्यादा फूट का सौदागर होता है। सनातन की विजय तब पूर्ण होती है, जब हर समाज—विशेषकर दलित भाई—उसमें सम्मान के साथ शामिल हों।

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