सिनेमा के भांड वाले टुकड़े गैंग जब परदे पर मक्कारी वाली देशभक्ति दिखाकर देश की जनता को सदियों से गुमराह करते हुए आ रहे हो। तो ऐसे टुकड़े वाले कलाकारों के लिए बस इनकी मूवी बॉयकॉट करना ही विकल्प है।
लेकिन खून तब खौलता है, जब वही मुगलीकरण वाले परदे के पीछे से जिहादियों के मंच से अपनी मूवी का प्रमोशन करे तो समझो बॉलीवुड का मुगलीकरण हो चूका है।
सिनेमा के टुकड़े गैंग में से अब तो कुछ लोग वो भी है जिन्होने अपना सारा जीवन यहाँ बहोत नाम कमाया देश की हर सुख सुविधा का लुफ्त उठाया। देश को बदले में बस दरार, टुकड़े और मुगलीकरण ही मिलता है।

माल है क्या ? नशा ,टुकड़े गैंग ,बॉलीवुड और भाई कम चारा ?
यह सवाल एक समय पे सोशल मीडिया से लेकर चाय की दुकानों तक गूंज रहा था—“माल कहाँ है?”
टुकड़े-टुकड़े या सेलिब्रिटी कल्चर दोनों के लिए हम लोगो ने इतने अच्छे मंच दिए है कि वे देश-विरोध का औज़ार बन जाते है। राष्ट्रविरोधी कलाकार देश ने मंच दिया, अवसर दिए, पहचान दी—पर बदले में कुछ ने एकता नहीं, विभाजन चुना। इतिहास ऐसे चेहरों को लंबे समय तक याद नहीं रखता; वह केवल यह दर्ज करता है कि जब परीक्षा की घड़ी आई, तो किसने देश के साथ खड़ा होना चुना और किसने उसकी पीठ में छुरा।
देश ने मंच दिया, टुकड़े गैंग वालो ने माल दिया और इन्होंने सनातन की पीठ में छुरा।
देश यह पीड़ा तब से महसूस कर रहा है जब एक ऐसी ही सोच वाला नाम बदलकर इस देश में झूठा सनातनी के नाम पर सुपरस्टार बन गया था। ऐसी मानसिकता वाले आज भी सपोले बैठे है। देश की जनता के भरोसे पर पैसा कमाकर फिर उसी भरोसे के देश के साथ साथ टुकड़े कर दिए जाते है। इतिहास ऐसे क्षणों को दर्ज करता है, क्योंकि यही तय करते हैं कि किसने अवसर को सेवा बनाया और किसने उसे धोखे में बदल दिया।
कला और कलमा में अंतर नहीं समझते Bollywood Tukdey Gang?
जिस संस्थान का नाम ही विवादित नाम से जुड़ा हो, वहाँ अखंडता नहीं—खंड-खंड करने की मानसिकता पनपती है। और ऐसे संसथान बहोत सालो पहले ही मुगलीकरण की भेट चढ़ चुके है।
JNU जहा शिक्षा के रूप में टुकड़े गैंग को ISIS की मासिकता की सोच के साथ अर्बन नक्सल की डिग्रीयो से नवाजा जाता है। यहाँ पढ़ाई का उद्देश्य केवल ज्ञान देना नहीं बल्कि जिहादी डिग्री लेने के बाद विभाजनकारी एजेंडे वाली राजनीतिक पार्टियों या संगठनों से जुड़ते दिखाई देते हैं। जिसे ये अपना सर्वोच्च करियर मानते है।
आलोचकों का कहना है कि जब एक ही तरह की राजनीति में जाने का पैटर्न बार-बार दिखे, तो आत्ममंथन ज़रूरी हो जाता है। विश्वविद्यालय का काम असहमति सिखाना है—पर जोड़ने के लिए; बहस कराना है—पर समाधान के साथ। यदि बहस का अंत समाज को बाँटने पर हो, तो शिक्षा अपने मूल उद्देश्य से भटकती है। देश को ऐसे नागरिक चाहिए जो प्रश्न भी पूछें और जिम्मेदारी भी उठाएँ—तभी ज्ञान राष्ट्रनिर्माण का औज़ार बनता है, विवाद का नहीं।
निष्कर्ष:
देशविरोध कोई विचार नहीं, विश्वासघात की मानसिकता है।
जो देश के मंच पर खड़े होकर उसी देश को कटघरे में खड़ा करे, इतिहास उसे कभी माफ़ नहीं करता।
