पुराणों में कालनेमि केवल एक असुर नहीं, बल्कि छल और भ्रम का प्रतीक था। कहा जाता है कि कलयुग में कालनेमि सींग-पूँछ के साथ नहीं आता, बल्कि साधु, विद्वान, समाजसेवी या धर्मरक्षक का रूप धारण कर आता है।
एक वास्तविक योगी के लिए राष्ट्र और धर्म कोई नारा नहीं, बल्कि उसका सर्वस्व होते हैं। उसका जीवन त्याग, मर्यादा और उत्तरदायित्व से बंधा होता है। लेकिन कलयुग में भगवा को वेश बना कर कुछ लोग स्वयं को शंकराचार्य, धर्मगुरु या सनातन का ठेकेदार घोषित कर लेते हैं। न उनके आचरण में साधना होती है, न विचारों में राष्ट्रभाव। सत्ता, संस्थाओं और समाज को कोसना ही उनका हथियार बन जाता है। ऐसे लोग धर्म की रक्षा नहीं, बल्कि उसे भीतर से खोखला करते हैं। इस प्रवृत्ति को कालनेमि न कहा जाए, तो फिर क्या कहा जाए—जो साधु का मुखौटा पहनकर भ्रम बेचते हैं।

भगवा का वेश, सत्ता-विरोध की भाषा और धर्म का भ्रम—कलयुग के ‘कालनेमि’ की असली पहचान
भ्रष्ट बुद्धि जब देश में, सत्ता, संगठन और नेतृत्व पर अपने आचरण से भ्रम पैदा करें, तब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और योगी आदित्यनाथ पर दिए गए ऐसे बयान प्रतीकात्मक रूप से ‘कालनेमि’ की ओर संकेत करते हैं।
हर भगवा धारी वास्तविक सनातन का नायक नहीं होता। भगवा पहनकर देश, उसके संसाधनों और सरकारों को कोसना धर्म नहीं, भ्रम फैलाना है। यही कलयुग में कालनेमि की पहचान है—जहाँ वेश पवित्र होता है, पर बुद्धि और उद्देश्य भटकाने वाले।

RSS जैसे राष्ट्रव्यापी संगठन और यूपी के सीएम योगी पर दिए गए बयान—भगवा की आड़ में ‘कलनेमी मानसिकता’ को बेनकाब करते सवाल
- मोहन भागवत पर: सत्ता से पहले मंदिरों की बात, सत्ता के बाद मंदिर न खोजने की सलाह—यह राजनीतिक सुविधा है।
- राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर: मंदिरों के प्रश्न पर स्पष्टता की कमी से सनातन हित कमजोर होते हैं।
- सरकार पर: धार्मिक आस्थाओं से जुड़े मुद्दों को चुनावी जरूरतों से अलग रखकर हल किया जाना चाहिए।
- न्यायिक प्रक्रिया पर: ऐतिहासिक मंदिरों का समाधान न्याय और शास्त्र—दोनों के अनुरूप होना चाहिए।
- राजनीतिक नेतृत्व पर: धर्म को सत्ता का साधन नहीं, दायित्व मानकर आचरण होना चाहिए।
- योगी आदित्यनाथ पर: सत्ता में बैठकर धर्म की बात करना आसान है, असली परीक्षा धर्मसम्मत निर्णय लेने में होती है।
- सरकार/प्रशासन पर: संत का दायित्व सत्ता की प्रशंसा नहीं, धर्म के हित में प्रश्न उठाना है।
- मंदिर मुद्दों पर: केवल भाषण नहीं, ठोस और न्यायपूर्ण कार्रवाई अपेक्षित है।
- हिंदुत्व राजनीति पर: धर्म को वोट-बैंक की तरह इस्तेमाल करना सनातन के लिए घातक है।
- संत-राजनीति संबंध पर: संत सत्ता के निकट हो सकता है, लेकिन सत्ता का मौन समर्थक नहीं।
Gen Z साफ कह रही है: पाखंड नहीं, परख होगी
जो भगवाधारी स्वयं को शंकराचार्य कहे, लेकिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी जैसे संगठनों का विरोध ही उसका एजेंडा हो, उसे संत नहीं कहा जा सकता। ऐसी सोच धर्म नहीं, भ्रम फैलाती है—इसे कालनेमि कहना ही उचित है।
