Mahagathbandhan

All indian party born to save country from congress, Now united to break the nation:- “जिनसे देश बचाना था, उसी के साथ मिलकर टुकड़े कर रहे हैं।”

“सोच टुकड़ों की, पार्टी खंड-खंड।”
टुकड़े गैंग जैसी सोच वाली पार्टी के राजनीतिक इतिहास पर नज़र डालें तो एक निरंतर गिरावट का ग्राफ़ दिखाई देता है। जहा गिरावट के साथ साथ खुद का भी गिरने का पैमाना सेट कर दिया है। इस राजनीती दल ने शुरआत से ही गिरने की राजनीती की है। आज़ादी से लेकर आज तक हर एक चुनाव में इस पार्टी ने अपनी मज़बूत ज़मीन खुद ही कमजोर की, जब की साजिसे देश को कमजोर करने की थी। नतीजा यह हुआ कि पार्टी ने अपनी ही बनाई जगह दूसरों के लिए छोड़ दी और धीरे-धीरे वह प्रभाव खोती चली गई, जो कभी उसकी सबसे बड़ी ताक़त हुआ करता था।
आज की राजनीति में Congress के लिए लक्ष्य सत्ता नहीं, बल्कि किसी तरह कुछ सीटें हासिल कर संसद में मौजूद रहना और हर अगले 5 साल तक रुदाली करनी।

उत्तर भारत: “राम-विरोध ने रास्ता रोक दिया।”
कांग्रेस की सबसे बड़ी गिरावट उत्तर भारत में नज़र आई।
उत्तर प्रदेश, जो कभी कांग्रेस की मज़बूत राजनीतिक प्रयोगशाला माना जाता था, वहाँ पार्टी 1985 के बाद सत्ता में लौट ही नहीं सकी। धीरे-धीरे संगठन ज़मीन से कटता गया और क्षेत्रीय दलों ने उसकी जगह ले ली।
यूपी में नमाजवादी उर्फ़ राम विरोधी के साथ मिलकर अधेड़ उम्र से लड़के बन के चुनाव लड़ा, फिर भी हासिल शून्य।”

बिहार में भी 1990 के बाद कांग्रेस हाशिए पर चली गई। सामाजिक और जातीय राजनीति के उभार के सामने पार्टी अपनी पहचान नहीं बचा पाई।
बिहार में कांग्रेस को मिया लालू ने चारे में लपेट के सदियों पहले ही निगल लिया था।
इन मुगलीकरण वाली पार्टियों को इन दोनों राज्यों में चुनाव चाहिए, तो राम-विरोध ही एजेंडा बनता है।

पश्चिम भारत: मज़बूत मकबरे ढहे।
गुजरात कांग्रेस के लिए सबसे बड़ा प्रतीकात्मक नुकसान रहा। 1995 के बाद से पार्टी वहाँ सत्ता से दूर है। लगातार चुनावी हार ने कार्यकर्ताओं का मनोबल तोड़ा और संगठन कमजोर होता गया।
और आज इसी गुजरात ने देश को हीरे जैसा P.M. दिया और इनके लिए पीढ़ियों से सत्ता को पारिवारिक विरासत की तरह देखते आए थे। जहाँ नेतृत्व जन्म से तय माना जाता था, वहाँ जनता की पसंद से निकला नेतृत्व इन टुकड़े गैंग वालो के लिए एक “बुरा सपना” बन गया है।

पूर्व भारत: कांग्रेस ने कभी अपना समझा ही नहीं।
पश्चिम बंगाल में 1977 के बाद कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई। समय के साथ उसका जनाधार लगभग खत्म हो गया।
ओडिशा में 2000 के बाद पार्टी कभी मज़बूती से वापसी नहीं कर पाई।
झारखंड जैसे राज्यों में सत्ता मिली भी, तो वह अस्थिर और अल्पकालिक रही।

दक्षिण भारत: मिली-जुली तस्वीर
दक्षिण में कांग्रेस का हाल पूरी तरह ख़त्म नहीं हुआ, लेकिन स्थिर भी नहीं रहा।
तमिलनाडु में 1967 के बाद पार्टी अपने दम पर सत्ता में नहीं आ सकी।
आंध्र प्रदेश (संयुक्त) में 2014 के बाद पार्टी लगभग गायब हो गई।
हाँ, कर्नाटक और तेलंगाना जैसे राज्यों में कभी-कभार वापसी हुई, लेकिन वह भी स्थायी पकड़ नहीं बना पाई।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *