Congress जो खुद 60 सालों से मज़दूरों के पसीने और खून की कमाई पर पल रहे हों, वे आज मज़दूर बनने का ड्रामा करें—ये बात हज़म नहीं होती। सत्ता में रहते हुए जिनके लिए मज़दूर सिर्फ़ वोट बैंक थे, आज वही ज़मीन से जुड़े होने का दिखावा कर रहे हैं। जिन हाथों ने कभी ईंट नहीं उठाई, वे संघर्ष की कहानियाँ सुना रहे हैं। ये सहानुभूति नहीं, कैलकुलेटेड स्क्रिप्ट है। अब लोग समझदार हैं—नारे नहीं, हिसाब माँगते हैं। मेहनत की इज़्ज़त चाहिए, फोटो-ऑप नहीं। सच यही है: जो शोषण से पले हों, वे मेहनत का मतलब नहीं सिखा सकते।
आज़ादी के बाद से वही परिवार, वही ड्रामा—किरदार बदलते हैं, मक़सद नहीं।
यह परिवार का ड्रामा देश आज़ादी के बाद से देख रहा है—कभी किसान, कभी मज़दूर, कभी गरीब का चेहरा। मुद्दे बदलते रहे, स्क्रिप्ट वही रही।
जब की इनका असली एजेंडा ज़मीन पर समाधान देना नहीं, बल्कि टुकड़े-टुकड़े वाली सोच को हवा देना और विदेशों में जाकर देश की छवि को नीचा दिखाना रहा है। जिस परिवार ने आज तक देश के लिए एक बूँद पसीना न बहाया हो और बल्कि मजदूरों के पसीनो पे ऐशो आराम की हो वो मजदूर नहीं सत्ता पाने की मजबूरी है, और नैरेटिव इस तरह गढ़ा जाता है कि देश हमेशा कटघरे में खड़ा दिखे।
सत्ता की मजबूरी खड़गे (भुढ़ापे) में मजदूरी?
जिस इंसान ने पूरी उम्र एक ही परिवार की चाटुकारिता में गुज़ार दी हो, वही जब रिटायर होने की उम्र में खुद को मज़दूर बताने लगे, तो सवाल उठना लाज़मी है। आज भूमिका बदली है, सोच नहीं। कल दरबारी, आज संघर्षशील—ये ट्रांसफ़ॉर्मेशन नहीं, रीब्रांडिंग है। एक ही परिवार के लिए कभी प्रवक्ता, कभी ढाल, कभी चेहरा—अब मज़दूर बनकर मैदान में उतरना सिर्फ़ डैमेज कंट्रोल लगता है। लोगों को दिखावा समझ आ रहा है।
मज़दूर का मुखौटा, टुकड़े गैंग की राजनीति
मज़दूर बनकर उतरी यह टुकड़े-टुकड़े गैंग की टोली की सोच देश ही नहीं, मज़दूरों को भी बाँटने का काम करेगी। झूठे मुद्दों की आड़ में भावनाएँ भड़काई जाएँगी, भोले भाले गरीब लोगो को आमने-सामने खड़ा किया जाएगा और असली मुद्दे पीछे छूटेंगे और टुकड़े टुकड़े फ्रंट पे रहेगा। हक़ की लड़ाई के बजाय नैरेटिव की लड़ाई चलेगी—जहाँ मज़दूर सिर्फ़ मोहरा बनेंगे। समाधान, कौशल और रोज़गार पर बात कम; आरोप-प्रत्यारोप ज़्यादा। लोग अब समझ रहे हैं कि मज़दूर की आवाज़ चाहिए, मास्क नहीं।
Gen-Z का कहना है कि इस पार्टी में आज वही लोग जुटे हैं, जिन पर टुकड़े वाली सोच को बढ़ावा देने का आरोप लगता रहा है अब वे खुद को मज़दूर बताकर मैदान में हैं। उनके मुताबिक यह राजनीति कम और भावनाओं का दोहन ज़्यादा है, जहाँ देश और गरीबों के पसीने–खून पर अपनी ताली बजाने की कोशिश होती है।
मेहनत की बद्दुआ
भगवान करे तुम लोग पूरी उम्र मज़दूरी ही करते रहो। जो आज मज़दूर बनने का नाटक कर रहे हो, काश तुम्हारी ये दुआ भगवान सच में सुन ले। पसीना बहाओ, भूख क्या होती है समझो, और हाल ऐसा हो कि मज़दूरों से भी ज़्यादा ग़रीब हो जाओ। तब पता चले कि मेहनत क्या होती है और शोषण क्या।
