Ravish Kumar की वैचारिक पहचान वामपंथी सोच से जुड़ी रही है और उनका रुख कांग्रेस के प्रति नरम दिखता है। सवाल यह उठता है कि जब देश लंबे समय तक आतंकवाद, भ्रष्टाचार, अव्यवस्था और किसान आत्महत्याओं से जूझ रहा था, तब सत्ता से उसी तीखे अंदाज़ में जवाबदेही क्यों नहीं मांगी गई? बंगाल में वामपंथी शासन के दौर में किसानों पर हुई हिंसा, सीमाओं पर जवानों पर अत्याचार, नक्सली हमले और आतंकी घटनाएँ—इन सब पर वही मुखरता क्यों नज़र नहीं आई? तब लोकतंत्र, संविधान और सेकुलरिज़्म खतरे में क्यों नहीं बताए गए? आज हर घटना को लोकतंत्र पर संकट बताना, स्क्रीन ब्लैकआउट जैसे प्रतीकात्मक विरोध करना, राफेल पर लगातार एपिसोड बनाना—लेकिन ऑगस्टा, नेशनल हेराल्ड और बड़े घोटालों पर चुप्पी—इन सवालों का जवाब दर्शक मांगते हैं। आलोचकों का कहना है कि वैचारिक झुकाव के कारण भाजपा के प्रति विरोध स्वाभाविक हो जाता है।
सोशल मीडिया ने तोड़ा वामपंथी वर्चस्व का भ्रम
सोशल मीडिया के दौर से पहले Ravish Kumar जैसे वामपंथी विचारधारा से जुड़े लोगों का प्रभाव व्यापक माना जाता था। इन्हें “बुद्धिजीवी” कहा जाता था और आलोचकों के अनुसार समाचार माध्यमों, विश्वविद्यालयों, सामाजिक संस्थानों, फिल्म उद्योग और इतिहास लेखन तक इनकी मजबूत पकड़ थी। उस समय जो कहा जाता, वही अंतिम सत्य मान लिया जाता। आरोप यह भी रहे कि यह धड़ा लगातार हिंदू विरोधी नैरेटिव को आगे बढ़ाता रहा और नक्सलियों, अलगाववादियों व कट्टरपंथियों के प्रति नरमी दिखाता रहा, जबकि दोष हिंदू समाज पर डाला गया। विरोध की आवाज़ें दब जाती थीं। सोशल मीडिया के आने से वैकल्पिक दृष्टिकोण सामने आए और वही चेहरे, जिनका प्रभाव निर्विवाद माना जाता था, अब खुली बहस के दायरे में आ गए।

JNU को इन वामपंथी विचारधाराओं की कोख कहा जाता है, जहाँ से वही नैरेटिव बार-बार जन्म लेता है।
कन्हैया, उमर जैसे वामपंथियों को नायक, और अफ़ज़ल, याकूब को मासूम बना देता हैं. सबरीमाला पे जम कर चर्चा होता हैं लेकिन तीन तलाक या बिशप द्वारा किये गए दुष्कर्म पे कोई चर्चा नहीं. कभी कभी १०-१५ सेकंड के लिए बस बोल देता हैं. इसके समर्थक भी अगर रविश को कुछ बोलो तो खूब सारा डावूनवोट्स कर देंगे आपको रिपोर्ट कर देंगे. सोशल मीडिया पे रविश कुमार फैन क्लब, एकलौता सच्चा पत्रकार बोल बोल के खूब प्रशंशा करते हैं. ये एक दूसरे का खूब ध्यान रखते हैं. ये सब के लिए भाजपा और हिन्दुओ कहे खिलाफ बोलना तो पड़ेगा ही.
एकलौता सच्चा वामपंथी पत्रकार
आज के दौर में यह मानना कठिन है कि कोई भी पत्रकार पूरी तरह निष्पक्ष है—चाहे अमेरिका हो या यूरोप, हर जगह पत्रकार किसी न किसी विचारधारा से प्रभावित दिखते हैं। भारत में भी लंबे समय तक अधिकांश मीडिया पर कांग्रेस-समर्थक झुकाव का आरोप रहा। भाजपा के सत्ता में आने के बाद मीडिया स्पष्ट रूप से दो खेमों में बँट गया। आलोचकों का कहना है कि Ravish Kumar जैसे पत्रकारों को यह असहज करता है कि उनके वैचारिक विरोधी अधिक लोकप्रिय और सम्मानित हो रहे हैं। इसी कारण “एकलौता सच्चा पत्रकार” जैसे टैग उछाले जाते हैं, जबकि दूसरों को “भक्त”, “चमचा” या “गोदी मीडिया” कहा जाता है—क्योंकि वे कथित तौर पर उसी खोखली, हिंदू-विरोधी और राष्ट्र-विरोधी सोच की परतें खोलते हैं।
