Hindus need to learn just one thing from extremists: कट्टरपंथियों से हिंसा नहीं, बल्कि रणनीति और निरंतरता सीखने की ज़रूरत है।

कट्टरपंथियों से सीखने की बात पत्थरबाजी वाली नहीं, बल्कि उनकी रणनीतिक सोच, कट्टरपन और अपने धर्म की निरंतरता की है। वे भावनाओं पर नहीं, लंबे लक्ष्य पर काम करते हैं। एक कट्टरपंथी अकेले 60 साल तक डटा रहा—न नारों के भरोसे, न भीड़ के सहारे, बल्कि नफरत, कट्टरता और एक टूटे ढांचे के लक्ष्य पर टिके रहकर।
इसी का सबसे बड़ा उदहारण आज का एक कट्टर परिवार अंसारी पिता-पुत्र है।

अगर कट्टरपंथी गरीब होकर 60 साल लड़ सकता है, तो साधन मिलने पर उसका असर कितना गहरा होता—यही सोच डराती है।
सोचिए हाशिम अंसारी जो अयोध्या में एक छोटी सी टेलर की दुकान चलाता था वह 60 सालों तक बाबरी मस्जिद का पक्षकार के तौर पर मुकदमा लड़ा क्योंकि उसका कहना था कि बाबरी ढांचा एक मस्जिद था और अयोध्या के तत्कालीन डीएम नैयर साहब ने मेरे सामने मूर्तियां रखी थी।
उसके मरने के बाद उसका बेटा इकबाल अंसारी पक्षकार बना जिसकी एक छोटी सी पंचर की दुकान है।
यह उदाहरण प्रशंसा का नहीं, चेतावनी का है, यह बताता है कि विचारधारा जब कट्टर हो जाती है तो लड़ाई में सालों या पत्थर नहीं देखे जाते।

अगर ऐसे कट्टरपंथी को पैसा, नेटवर्क, संरक्षण मिलता, तो शायद यही कट्टर मुल्ला बाबर बन जाता।
कट्टर जिहादी सोच का सबसे बड़ा खतरा हिंसा के साथ साथ, उसकी अंधी वैचारिक जकड़न है, जो उसे समय समय पर हथियार उठाने को मजबूर भी करती रहती है, और ये खेल आज से नहीं 1200 सालो से चला आ रहा है।
हिन्दुस्तान में मुगल साम्राज्य की नींव रखने वाले बाबर को भी समलैंगिक बताया गया. इसका जिक्र उसकी जीवनी बाबरनामा में किया गया है. बाबर ने अपने समलैंगिक मित्र के लिए कई शेरों-शायरी लिखी हैं.

क्या समलैंगिक(Gay) बाबर के लिए लड़े कटरपंथी ?
बाबरनामा में लिखा है कि कैसे 17 साल की उम्र में बाबर एक लड़के के प्यार में पड़ा. उस लड़के का नाम था बाबरी आंदिजानी. उसकी तरफ आकर्षित हुआ. अपनी जीवनी में बाबर ने लिखा कि उर्दू बाजार में बाबरी नाम के लड़के से लगाव हुआ. उससे मुलाकात के पहले तक मुझे वैसा आकर्षण किसी के साथ नहीं हुआ. जब भी वो मेरे सामने आता था जो मैं शर्म के मारे सीधे तौर पर उसे देख तक नहीं पाता था.

अब जागने का समय है: हिंदुओं को अपनी सोच, संस्कृति और जिम्मेदारी को फिर से समझना होगा।
दरअसल आप समझिए हिंदुओं की सोच और शांति दूतों की सोच में क्या फर्क होता है। इतनी गरीबी में रहने के बाद भी यह कभी नहीं बिका.. अगर इसकी जगह कोई हिंदू होता तो शायद कब का बिक चुका होता और हिंदुओं का क्या कहें जब इसका घर एक दुर्घटना में जल गया था तब अयोध्या के हिंदुओं ने ही हाशिम अंसारी का नया घर बनवाने में मदद किया इतना ही नहीं उसे मुकदमे के लिए बार-बार कोर्ट जाना पड़ता था तो हिंदुओं ने उसे अंबेसडर कार खरीद कर दिया था और हाशिम अंसारी के निधन पर मुस्लिमों से ज्यादा हिंदू जुटे थे
और यह बड़े गर्व से बताता था कि मुझे मुकदमा के लिए मुस्लिमों से ज्यादा डोनेशन हिंदू देते हैं।

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