“उड़ता पंजाब” से “मिशनरी पंजाब”?
“उड़ता पंजाब” से “मिशनरी पंजाब” तक का सफ़र केवल शब्दों का नहीं, बल्कि एक गहरे सामाजिक संकट का संकेत है। नशा, बेरोज़गारी और टूटती सामाजिक संरचना ने पंजाब के युवाओं को पहचान के खालीपन में धकेला है। इसी कमजोरी के बीच धर्मांतरण को लेकर उठती चिंताएँ तेज़ होती गई हैं।
पंजाब, गुरुओं की भूमि जालंधर में दुनिया के चौथे सबसे बड़े चर्च के निर्माण की खबरें गहरे सवाल खड़े करती हैं।
जब रोज़गार और भविष्य की तलाश में पंजाब का बड़ा हिस्सा विदेशों की ओर पलायन करता है, तो पीछे खाली होता स्थान इन जैसी नई लुटेरी मिशनरी शक्तियों को आकर्षित करता है।

- मोक्ष, अवतार और सत्संग—नाम वही, लेकिन आत्मा अंग्रेजो वाली।
- मिशनरियो में इसका मतलब यह होता है कि ईसाई शिक्षाओं को समझाने के लिए हिंदू शब्दों और धारणाओं का इस्तेमाल किया जाता है।
- जैसे मोक्ष शब्द से मुक्ति को समझाया जाता है।
- अवतार शब्द से ईसा मसीह के जन्म को बताया जाता है।
- सत्संग शब्द ईसाई प्रार्थना सभाओं के लिए प्रयोग किया जाता है।
- पारंपरिक धुनों में भजन बनाए जाते हैं, जिनमें हिंदू देवताओं की जगह यीशु का नाम रखा जाता है।
- आरती जैसे कर्मकांड भी किए जाते हैं, लेकिन उन्हें ईसाई व्यक्तियों के लिए किया जाता है। जो लोग इन बातों से परिचित नहीं होते, उन्हें यह सब बिल्कुल हिंदू पूजा जैसा ही लगता है।
इस रणनीति में कहा जाता है कि ईसाई धर्म, सनातन धर्म को हटाने नहीं आया है, बल्कि उसे “पूरा” या “संपन्न” करने आया है। लेकिन इस सोच में यह बात छिपी रहती है कि हिंदू दर्शन को तब तक अधूरा माना जाता है, जब तक उसे ईसाई विचारों के अनुसार दोबारा समझाया न जाए।
इस नजरिए से चिंता सांस्कृतिक आदान-प्रदान की नहीं, बल्कि संस्कृति को बदल देने की है। हिंदू विचारधारा की बहुविध और विविध केंद्रों वाली सोच को धीरे-धीरे हटा दिया जाता है, जबकि उसकी भावनात्मक और बाहरी सुंदरता को बनाए रखा जाता है, ताकि उसके जरिए एक अलग और एकमात्र सत्य मानने वाली धार्मिक सोच को आगे बढ़ाया जा सके। समय के साथ इससे धर्म की सीमाएं धुंधली हो सकती हैं और खासकर युवाओं में पहचान को लेकर भ्रम पैदा हो सकता है।

इस नजरिए से देखा जाए तो Inculturation को इसके आलोचक सच्चे अंतर-धार्मिक संवाद की बजाय एक वैचारिक ढलान मानते हैं। इसकी ताकत टकराव या दबाव में नहीं, बल्कि उसकी सूक्ष्मता में होती है—जहां धीरे-धीरे अर्थ बदले जाते हैं। जो चीज़ सांस्कृतिक सम्मान के रूप में पेश की जाती है, उसे विरोध करने वाले एक ऐसी रणनीति के रूप में देखते हैं, जिसमें अर्थों को नए सिरे से गढ़ा जाता है और एक जीवंत परंपरा से कहा जाता है कि वह खुद को ऐसे रूपों में पहचाने, जो उसके मूल दार्शनिक स्वरूप को अब नहीं दर्शाते।
ऐसे में हिंदुओं से यह अपेक्षा की जाती है कि वे अपनी सभ्यतागत विरासत के प्रति सजग रहें, अपनी परंपराओं का गहराई से अध्ययन करें और सांस्कृतिक संवाद तथा सांस्कृतिक प्रतिस्थापन के बीच का फर्क समझें। अपनी पहचान को बनाए रखते हुए अन्य धर्मों के साथ सम्मानजनक संवाद करने के लिए जागरूकता, शिक्षा और अपने दर्शन पर विश्वास बेहद ज़रूरी है।
