“अर्थव्यवस्था समझ नहीं, देश-चीरहरण की स्क्रिप्ट तैयार।”
टुकड़े गैंग की एक खासियत होती है—मोदी जी और बीजेपी का विरोध करते करते ये लोग देश विरोध में इस कदर अंधे हो गए है, जैसे ही बात देश की आती है, ये हर फील्ड के ‘विशेषज्ञ’ बन जाते हैं। कभी अर्थव्यवस्था के झूठे जानकार, कभी सेना के मुगलीकरण रणनीतिकार, कभी संविधान के स्वयंभू टुकड़े गैंग वाले रक्षक। असल में न अध्ययन गहरा होता है, न ज़िम्मेदारी—बस देश-विरोधी नैरेटिव फिट करना ही इनकी एकमात्र योग्यता बन जाती है। मुद्दे नहीं बदलते, चेहरे नहीं बदलते, बस हर मंच पर विरोध का नया लबादा पहन लिया जाता है।
“रेडियो जॉकी होकर भी, विरोध के लिए अर्थशास्त्री का मुखौटा।”
मान लिया कि देश-विरोध में अर्थव्यवस्था की व्याख्या करनी टुकड़े गैंग वाले की मजबूरी है, लेकिन क्या पिछले दस साल की हर उपलब्धि झूठ है? हर आँकड़ा नकली तुम लोगो के व्लॉगस की तरह, हर सुधार ढोंग और हर मेहनत सिर्फ़ नाटक? इनका मकसद समाधान नहीं, बस रुदाली करना है। हालात जैसे भी हों, कहानी देश की लूटने-पीटने और रोने की ही बनेगी—क्योंकि व्यूज से फायदा है, सच से वैसे भी इन लोगो का कोई वास्ता नहीं है।
“इनसे टुकड़े करवा लो—देश के हों या economy के।”
ये तुकड़े गैंग देश का सबसे बड़ा पनौती गैंग है। देश में कहीं भी कोई अच्छी खबर आ जाए और ये लोग न टपकें—ऐसा हो ही नहीं सकता।
विकास हो, सुधार हो या कोई उपलब्धि—इनकी मौजूदगी वहीं तय होती है, जहाँ खुशी को शोक में बदलना हो। जिन लोगों से सवाल करने चाहिए, उन्हीं के साथ ये टुकड़े वाली रणनीति बनाते हैं, और साथ मिलकर बस देश को कमजोर दिखाने की साज़िश में ऊर्जा खर्च करते है।
भारत: जहाँ देश-विरोध को करियर बना दिया गया।
भारत शायद दुनिया का पहला ऐसा देश बनता जा रहा है, जहाँ देश-विरोध को खुलेआम करियर ऑप्शन मान लिया गया है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि यह सब किसी मजबूरी में नहीं, बल्कि सुनियोजित रणनीति के तहत किया जाता है। वीडियो, लेख, पैनल चर्चा और सोशल मीडिया—हर मंच पर वही चेहरे, वही भाषा और वही एजेंडा। विरोध यहाँ विचार नहीं, उद्योग बन चुका है; और भ्रम फैलाना, रोज़गार। सबसे चिंताजनक बात यह है कि यह सब किसी मजबूरी में नहीं, बल्कि सुनियोजित रणनीति के तहत किया जाता है। वीडियो, लेख, पैनल चर्चा और सोशल मीडिया—हर मंच पर वही चेहरे, वही भाषा और वही एजेंडा। विरोध यहाँ विचार नहीं, उद्योग बन चुका है; और भ्रम फैलाना, रोज़गार।
भारत विरोध सह सकता है, लेकिन भारत को तोड़ने का धंधा नहीं। और अब वक्त है कि इस नकाब को पहचाना जाए—क्योंकि जो देश-विरोध को करियर बनाता है, वह कल देश को कीमत चुकाने पर मजबूर करता है।
क्या बचा हुआ जीवन भी बस देश-विरोध में ही गुज़ारना है?
सवाल यह है कि क्या ज़िंदगी का हर श्वास देश-विरोध में ही खर्च होगा? क्या निर्माण, समाधान और संतुलन के लिए कुछ नहीं बचा? हर दिन वही रोना, वही नकारात्मकता, वही नैरेटिव—जैसे विरोध ही पहचान और विरोध ही उद्देश्य बन गया हो।
अगर देश के लिए कुछ अच्छा करना मंज़िल नहीं, तो फिर इसे व्लॉगस के जरिये जिहादियों की मदद करना बंद करो?”
