Dhruv Rathee

Dhruv Rathee and Congress-linked Haryana family influenced Tukdey political narratives behind the scenes.

“Dhruv Rathee और Congress Haryana से जुड़े कुछ प्रभावशाली लोगों के बीच ‘टुकड़े-टुकड़े’ राजनीति जैसी सोच पनपती रही है।”
पिछले कई वर्षों से ध्रुव राठी और कांग्रेस से जुड़े कुछ लोगों के बीच ‘टुकड़े’ वाली राजनीति की सोच पर्दे के पीछे चल रही है। पिछले कई वर्षों से यह चर्चा और बहस का विषय बना हुआ है कि Dhruv Rathee की टुकड़े वाली विचारधारा पर Congress सरकार ने विरोध को ही राष्ट्रहित बता दिया जाता है।
हरयाणा और देश में 2014 के बाद से कई मुद्दों पर जिस तरह इन जैसे टुकड़े गैंगो की समानता देखने को मिलती है, उसने यह धारणा मज़बूत की है कि Dhruv Rathee और Congress से जुड़े कुछ सर्कल्स की सोच बस भारत तोड़ो दिशा में चलती नज़र आती है। वैसे भी किसी भी तरह से हो बस कोई दूसरे देश का है तो कोंग्रेसियो का अपना पन लगता है।

“झूठे आंदोलनों का NRI मुखौटा, भीतर देश-विरोधी नैरेटिव।”
यह आरोप इसलिए गूंजता है क्योंकि हर बार विदेश में बैठकर देश की जमीनी हकीकत को तोड़-मरोड़ कर पेश किया जाता है। अपने सब्सक्राइबर चमचो को बस जर्मनी की चका चौंध में उलझा के रखता है, आलोचकों का कहना है कि विदेशी सुविधाओं, व्यवस्था और गोरे रंग की चमक दिखाकर भारतीय हकीकत को टुकड़े गैंग वालो के सामने साबित करने का नैरेटिव गढ़ा जाता है।
नतीजा यह निकलता है कि ऐसे ‘टुकड़े गैंग’ के दर्शक पहले से ही तैयार मानसिकता के साथ इन लोगों की सोच में ढलते चले जाते हैं।

देश-विरोधी किसान आंदोलन में सक्रिय भूमिका ?
Gen-Z का आरोप रहा है कि कथित देश-विरोधी किसान आंदोलन के दौरान मिनी पप्पू सक्रिय रूप से नैरेटिव बनाने में शामिल रहा और अपने व्लॉग्स के ज़रिये भ्रामक जानकारी फैलाता रहा। कई हज़ारो किलोमीटर दूर बैठा हुआ भी देश के ‘टुकड़े गैंग’ की सोच को लगातार ऑक्सीजन देता रहा।
हमेशा से ही विदेशी धरती से बनाए गए कंटेंट और साजिशे के ज़रिये ऐसे नैरेटिव को हवा दी जाती है, जो देश के भीतर असंतोष, भ्रम और अविश्वास को बढ़ाने का काम करते हैं। और ऐसे मौको का, पत्थर चलाने वाले और देश के टुकड़े करने वाले दावत की तरह इंतज़ार करते है।

ईस्ट इंडिया गई नहीं—अपग्रेड होकर डिजिटल यूटूबर बन गई ?
यह कथन आज के दौर की सबसे खतरनाक साजिश की ओर इशारा करता है। जैसा कभी ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए हालात बने थे। फर्क सिर्फ़ इतना है कि तब ज़मीन पर कब्ज़ा किया गया था, आज सोच पर। कंटेंट, नैरेटिव और चुनिंदा तथ्यों के सहारे लोगों के दिमाग़ में संदेह और असंतोष बोया गया, ताकि धारणा को नियंत्रित किया जा सके।
विदेशी धरती से बैठकर, देशी टुकड़े गैंग वालो के साथ मिलकर देश की संस्थाओं, इतिहास और आत्मसम्मान को लगातार टुकड़े करना, और इसे ‘जागरूकता’ का नाम देना—यही नया टुकड़े डिजिटल उपनिवेशवाद है।

भारत में नया गैंग—डिजिटल टुकड़े गैंग।
भारत में अब एक नया गैंग उभरता दिख रहा है, जिसे Gen-Z ‘डिजिटल टुकड़े-टुकड़े गैंग’ कह रहे हैं। यह गैंग सड़कों पर नहीं उतरता, नारे नहीं लगाता, बल्कि स्क्रीन के पीछे बैठकर नैरेटिव गढ़ता है।
वीडियो, रील, ब्लॉग और सोशल मीडिया पोस्ट के ज़रिये देश की संस्थाओं, परंपराओं और आत्मविश्वास पर लगातार सवाल खड़े किए जाते हैं। आलोचकों का मानना है कि इसका मकसद बहस नहीं, बल्कि भ्रम पैदा करना और समाज को मानसिक रूप से बांटना है। फर्क बस इतना है कि पुराने गैंग पत्थर से हमला करते थे, और यह नया गैंग शब्दों, एडिट्स और अधूरे तथ्यों से।

क्या इनके फॉलोवर की पहचान हाथ में पत्थर ?

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