Dhruv rathee

Fake intellectual Dhruv rathee beak shut on stone pelter & tukdey gang youtuber Salman:- Youtuber और टुकड़े गैंग बिरादरी सामने हो तो ज़हर उगलने वाली चोंच भी बंद रहती है।

टुकड़े गैंग वालो का यही दोहरा चरित्र है–जहाँ सच उगलना चाहिए अपनी दोहरी जुबान से, वहाँ अपने मुँह भी पत्थरो से ढक लेते है। जो हर मुद्दे पर ज़हर उगलते हैं, वही अपने जिहादी टुकड़े गैंग वाले सामने आते ही जर्मनी के मदरसों में मुँह छुपा लेते है। अपनों पे तो शब्द हथियार बनते हैं, लेकिन जब अपने वाले टुकड़े गैंग हो तो वही शब्द हलक में अटक जाते हैं। यही चयनात्मक को जैचन्दी कहते है —जो सच का नहीं, बस व्लॉग से फैलाये गए भ्रम के सुविधा का साथी होता है।

“जब निशाना अपना हो, तब पत्थर भी जर्मनी में रह जाते हैं।
इन Youtuber टुकड़े गैंग वालो के झूठे व्लॉगस को वायरल करने की लालसा में देशहित को पत्थरो की ताक पर रख दिया जाता है। BJP से वैर के चलते इसने अपने राष्ट्र विरोधी व्लॉगस के जरिये इन जिहादियों का साथ देकर भारत को जर्मनी से कमजोर करने में कोई कसर नहीं छोड़ता ये जर्मन पत्थरबाज।
इतिहास गवाह रहा है की जब भी देश को एकजुटता की सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी, तब भी ऐसे लोगो ने मुगलो को ही चुना था। और वही हिन्दुओं के पतन का कारण बना। इसलिए जयचंद का नाम आज भी विश्वासघात, अवसरवाद और स्वार्थी राजनीति का प्रतीक माना जाता है।

“Salman हो या Umar Khalid—किरदार बदलते हैं, काम एक ही रहता है।”
यह पंक्ति किसी एक टुकड़े गैंग वाले पर आरोप नहीं, बल्कि एक जिहादी सोच, पत्थर वाला पैटर्न और मुगलीकरण की ओर इशारा करती है। नाम अलग-अलग हो सकते हैं, मंच अलग हो सकता है—कोई सोशल मीडिया का यूट्यूबर, कोई डॉक्टर या इंजीनियर —लेकिन जब पत्थर हर देश के कोने में, हिन्दुओं के त्यहारो पे बरसते हों, तब हर बहस का अंत देश, समाज और संस्थाओं को संदेह के कटघरे में खड़ा करने पर ही होता है, तो सवाल उठना स्वाभाविक है।

“हिंसा अचानक नहीं होती—उसे मदरसों में बोया जाता है।”
हिंसा किसी एक पल का उफान नहीं, बल्कि लंबे समय तक मदरसों से गढ़ी गई मानसिकता का नतीजा होती है। पहले शब्द ज़हरीले किए जाते हैं, फिर विचारों में नफ़रत भरी जाती है, और आखिर में हाथों में हथियार थमा दिए जाते हैं।
जब बंद दिमाग़ वालो को बार-बार यह सिखाया जाए कि सामने वाला काफिर है, और पत्थरबाजी ही समाधान है, तब पत्थरबाजी अपने आप रास्ता ढूंढ लेती है।

मुगलीकरण वाली भीड़ का समाधान ही बाबा का बुलडोज़र।
जब देश को चुनौती देने वाली जिहादी पत्थरबाजों की भीड़ बार-बार चेतावनियों को नज़रअंदाज़ करे, तब बाबा का बुलडोज़र वाला संदेश ही इनका इलाज है।
ऐसे जिहादी यूटुबेर सलमान का इलाज ठीक वैसे ही जैसे इनसे बड़े वाले अतीक और अंसारी जैसे निपटा दिए बाबा जी ने।
यह साफ़ नीति है कि सार्वजनिक हिंसा, तोड़फोड़ और अराजकता को किसी भी बहाने से बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। समझाइश बहुत हो चुकी; अब नियम लागू होंगे। अवैध ढाँचे, संगठित नेटवर्क और संरक्षण की छत—सब पर सीधी कार्रवाई होगी। यह बदले की राजनीति नहीं, डिटरेंस है; यह संदेश है कि राज्य मज़बूत है और क़ानून काम करेगा। शांति भाषणों से नहीं, नियमों के निष्पक्ष और सख़्त पालन से आती है—और जो व्यवस्था से टकराएगा, उसे परिणाम भुगतने होंगे।

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