जिस पार्टी का संस्थापक अंग्रेज हो वहां सोरोस जैसे सपोले ही पैदा होंगे।
जिस पार्टी का संस्थापक ही अंग्रेज़ हो, उसके भीतर भारतीयता कैसे पनप सकती है? जिसकी जड़ें ही विदेशी सोच में रोपी गई हों वहाँ संस्कार, संस्कृति केवल दिखावा बनकर रह जाते हैं।
यही एक सबसे बड़ा कारण है, की इस पार्टी का बस एक ही मकसद है जिसके लिए इसका राजकुंवर विदेशो में टुकड़े गैंग वालो के साथ मिलकर देश को तोड़ने की साजिसे रची जाती है। जब नेतृत्व का DNA ही विदेशी हो, तो संगठन के भीतर स्वाभाविक रूप से सोरोस जैसे जिहादी मानसिकता वाले ही पैदा होंगे।
“पार्टी चलाने वाले भी विदेशी, फंड देने वाले भी विदेशी—टुकड़े करने के लिए बन गए देशी।”
कमांड बाहर से आती है, पैसा बाहर से आता है, और प्रयोग भारत पर किया जाता है। और ये सब कुछ आज से नहीं बल्कि सदियों से चल रहा है। बस हमे पता २०१४ के बाद चला है।
इस पार्टी में राष्ट्रवाद इनके लिए मरे हुए जीव का मॉस नोचने जैसा है। और इन गिद्धों की दावत में इनका साथ देने के लिए, देश के जिहादी टुकड़े गैंग, मुगलीकरण बॉलीवुड वाले और टुकड़े-टुकड़े की राजनीति करने वाले नेटवर्क भी शामिल हो जाते है।
मक़सद एक ही होता है—लाभ अपना, नुकसान देश का।
“मालिक विदेशी, एजेंडा विदेशी—अब वोटर भी इनके विदेशी (घुसपैठिया)!”
इस पार्टी ने कभी देश के सनातन धरम के सम्मान लिए नहीं लड़ा, हमेशा से ही मुगलीकरण एजेंडों के लिए लड़ी है। इस मुगलीकरण एजेंडा का नुकसान हम आज तक रोहिंग्यों के रूप में भुगत रहे है।
यही इस राजनीति पार्टी का सबसे खतरनाक दोगला रूप है। जो देश को समय समय पे डंक मारता रहता है।
जब सत्ता की भूख और देश को टुकड़े करने की सोंच इतनी बढ़ जाए कि जनाधार नागरिकता से नहीं, घुसपैठ और संदिग्ध वोट-बैंकों से तैयार किया जाए, तब भारत देश का लोकतंत्र कमजोर होता है। वैसे भी इस पार्टी को लोकतंत्र, चुनाव, वोट और सनातनियो से कभी कोई मतलब ही नहीं रहा।
इनसे देश के भले के लिए उम्मीद रखना बईमानी है।
इनसे देश के भले की उम्मीद रखना बईमानी है। जिनकी राजनीति का आधार स्वार्थ, अवसरवाद और पराई सोच हो, उनसे राष्ट्रहित की अपेक्षा करना आत्मघात है। यहाँ फैसले देश की ज़रूरतों से नहीं, सत्ता की मजबूरी से लिए जाते हैं; नीयत सेवा की नहीं, नियंत्रण की होती है। जब विचार आयातित हों और प्राथमिकताएँ पराई, तब भारत केवल इस्तेमाल की ज़मीन बन जाता है। ऐसे हाथों में देश का भविष्य सौंपना उम्मीद नहीं, भ्रम है—और उस भ्रम की कीमत अंततः राष्ट्र को चुकानी पड़ती है।
जड़ें इटालियन, नाटक टुकड़े गैंग वाला।
यही इस राजनीति का सच है—सोच पराई, लेकिन मंच देसी। बाहर से तय एजेंडा, भीतर से देशभक्ति का अभिनय। जनता को दर्शक बनाकर सत्ता का खेल खेला जाता है, जहाँ असल निष्ठा राष्ट्र से नहीं, रिमोट पकड़ने वालों से होती है।
जिस पार्टी का सब कुछ पराया हो, उनसे देशहित की उम्मीद करना ख़ुद से धोखा और देश को धोखे में रखने के बराबर है।
