Dhruv Rathee,Tukdey gang and Ghuspathiya, Wait Feels Like Vultures Ready to Tear the Nation in Bengal election:-“बंगाल चुनाव, राष्ट्र निर्माण या राष्ट्र-नोच”?

जर्मनी के गिद्ध और इंडियन कौवे, जैसे जिहादी और टुकड़े गैंग एक साथ।
फिलहाल देश ने देखा है एक गिद्ध जो बाहर से आता हैं—चालाक, धैर्यवान और व्लॉग-परस्त है। जर्मनी के गिद्ध सीधे हमला नहीं करते, वे पहले माहौल को अपने व्लॉगस से लाश का ढेर बना देते है, फिर उसी लाश को नोचने के लिए गिद्ध के साथ साथ अपने देशी कौवों और टुकड़े गैंग वाले भी अवसर का फायदा उठाकर बड़े लुफ्त लेते है।

“जर्मनी में बैठकर भारत पर मंडराने वाले गिद्ध, न देश के हैं न संस्कार के।”
भारत देश में कही भी चुनाव हो पर टुकड़े गैंग के साथ अब अर्बन नक्सल हज़ारो किलोमीटर दूर से देश को नोचने के लिए व्लॉगस रेडी रखते है। बहस की जगह भ्रम बोलते हैं, HD वीडियो दिखा कर डर फैलाते हैं और विकास की जगह टुकड़े गैंग का एजेंडा चलाते हैं।
ये देश की बर्बादी का इस प्रकार इतंज़ार करते है, जैसे जिन्ना नै आज़ादी के समय भारत की बर्बादी का सपना देखा था। इन जैसे नरभछियो के लिए भारत हमेशा से ही एक आसान नोचने वाला टुकड़ा दीखता है।

इन गिद्धों की हिम्मत यूँ ही नहीं बढ़ी है।
इन जैसो की तरह देश की सदन में बैठा विपक्ष भी जब इनके सुर में सुर मिला रहा हो, तब ऐसे गिद्ध और भी बेख़ौफ़ हो जाते है। फिर सारा सिस्टम एक साथ टुकड़े टुकड़े गैंग की तरह अलग-अलग ताक़तें मिलकर मुगलो की तरह देश पे एक साथ टूट पड़ती हैं। बाद में ये सारी ताकते मिलकर देश को डर और नोच-खसोट की तरफ धकेलते है।
विदेशी गिद्ध जो पैदा तो इसी मिटटी से हुए है, यहीं इन लोगो ने उड़ना भी सीखा पर जब नोचने की बात आयी तो भूल गए की हम अपने देश को ही नोच रहे है।इन्हें इस देश की पीड़ा से नहीं, उसकी कमज़ोरी से मतलब होता है। यही सबसे खतरनाक गिद्ध हैं

जयचंदन गिद्ध वो होते हैं जो देश में पैदा होकर विदेश में बैठकर देश के खिलाफ उड़ान भरते हैं।”
ये वे लोग हैं जिनकी पहचान इसी मिट्टी से बनी, भाषा यहीं की सीखी, सुविधाएँ यहीं पाईं लेकिन राष्ट्रभक्ति जर्मनी में गिरवी रख दी, देश को गिराते गिराते खुद कितना गिर गए है शायद ये लोग भूल गए है। ये खुली दुश्मनी नहीं दिखाते बल्कि अपने झूठे व्लॉगस से देश के अंदर युद्ध जैसा माहौल दिखाते है, ये भीतर रहकर भरोसा काटते हैं, देश के इतिहास में छेड़ छाड़ कर के मुगलीकरण की तरफदारी करते है। इन गिद्धों की चोंचों के शब्दों में राष्ट्र बोझ लगता है, संस्कृति दुश्मन लगती है।
अपने ही घर में पंख फैलाए जयचंदन गिद्ध राष्ट्र की रीढ़ को चुपचाप नोचते रहते हैं।

उनसे तो लड़ना ही है, पर अपने गिद्धों का क्या करें?
देश के टुकड़े गैंग के विरोधियों से मुकाबला स्पष्ट होता है, लेकिन कुछ भीतर के और कुछ जो हज़ारो किलोमीटर दूर जाकर बैठे हुए गिद्धों से निपटना ही हमारी सदियों की लड़ाई है। कई बार इन लोगो के धोके को देश ने बहोत बड़ी कुर्बानी देकर झेला भी है, पर जिनका खून ही जर्मन वाला पानी बन गया हो, तो देश वाशियो का फ़र्ज़ बनता है की इसकी चोंच को काट दिया जाये।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *