अब यह मुद्दा धर्म का नहीं, बल्कि सुरक्षा, संस्कृति और अधिकारों का है। अवैध घुसपैठ और टुकड़े गैंग से बंगाल के स्थानीय नागरिकों की पहचान, रोज़गार और संसाधनों को आखिरकार बचाना भी देश में एक ही पार्टी का फ़र्ज़ है।
बंगाल ने वर्षों से कई निर्दोष हिंदुओं सहित आम नागरिकों को कत्लेआम देखा है। आज के युग में ये सुभाष चंद्र बोस का बंगाल नहीं बल्कि मिनी बांग्लादेश बन चूका है। हिंसा के हर मामले के पीछे बस एक ही समुदाय का नाम आता है, और ऐसे समुदाय के जिहादी घुसपैठिओ को बंगाल की धरती पे जमाई बना के रखा जाता है।

दोनों तरफ बेचारा हिन्दू काफिर ही मारा जाता है।
हर टकरावों और हिंसक घटनाओं के बीच सबसे ज़्यादा नुकसान बस हिंदू नागरिकों को उठाना पड़ा है। जो दोनों ओर के संघर्षों में फँसकर मरते रहते है। अपने ही देश में अपने ही नागरिक को उसकी धर्म के पहचान के आधार पर निशाना बनाना बंगाल की संस्कृति बन चकी है। र्म की पहचान के आधार पर लोगों को निशाना बनाया जाना धीरे-धीरे बंगाल की सामाजिक समस्या बनती जा रही है, जो उसकी ऐतिहासिक संस्कृति और सहिष्णुता की परंपरा के विपरीत है।

चुनाव के समय लोकतंत्र नहीं, बांग्लादेश जैसा नरसंहार का माहौल क्यों दिखता है?
लोकतंत्र देश में बंगाल का चुनाव हमेशा से ही देश पे एक धब्बे की तरह होता है। चुनाव आते ही जब सड़कों पर डर, धमकी, पलायन और खून-खराबे की ख़बरें दिखने मिलनी लगती है। बंगाल अक्सर चुनाव के टाइम पे कई बार एक तरह का वॉर जोन तक बन जाता है और देश के कई हिस्सों से भी कट जाता है।
ऐसा प्रतीत होता है की मानो आज भी बंगाल की आज़ादी की लड़ाई चल रही है।
क्रांतिवीरों की भूमि बंगाल बनी घुसपैठियो की जिहादी जमीन।
बंगाल का नाम लेते ही क्रांति, विचार और बलिदान की विरासत याद आती थी। लेकिन हाल के वर्षों में जिहादी अवैध घुसपैठ, और कट्टरपंथी अब राज्य की सरकार के नेटवर्क में तक घुस गए है और उसे कंट्रोल भी करने भी लगे है।
चुनावी मौसम में यह संकट और गहरा दिखता है। डर, धमकी और अव्यवस्था की खबरें लोकतंत्र के मूल विचार को चोट पहुँचाती हैं। वोट देना अधिकार है, लेकिन जब वह जोखिम बन जाए, तो व्यवस्था की नाकामी उजागर होती है। क्रांति का अर्थ अराजकता नहीं; क्रांति का अर्थ है न्याय, अनुशासन और नागरिक साहस—जो मज़बूत संस्थाओं से आता है।
वामपंथ से निकला बंगाल, गुंडाराज,घुसपैठ और टुकड़े गैंग में फसा।
बंगाल ने दशकों तक वामपंथी शासन देखा—जहाँ विचारधारा मज़बूत थी, पर ज़मीनी स्तर पर हिंसा, कैडर संस्कृति और राजनीतिक दबाव के आरोप भी उतने ही गहरे रहे। उस दौर से बाहर निकलते समय उम्मीद थी कि बदलाव के साथ सुरक्षा, पारदर्शिता और लोकतांत्रिक भरोसा लौटेगा। लेकिन आज कई सवाल फिर खड़े हैं—क्या सत्ता बदली, या केवल समस्याओं का चेहरा?
राज्य में गुंडाराज के आरोप, स्थानीय दबदबे की राजनीति और प्रशासनिक ढिलाई की शिकायतें आम होती जा रही हैं। चुनावी समय में डर, धमकी और अव्यवस्था की खबरें लोकतंत्र की बुनियाद को हिला देती हैं। आम नागरिक के लिए वोट देना अधिकार से ज़्यादा जोखिम बनता दिखे—तो यह व्यवस्था की विफलता का संकेत है, किसी विचारधारा की जीत का नहीं।
