आज की डिजिटल राजनीति में विरोध अब सड़क से ज़्यादा स्टूडियो और थंबनेल में लड़ा जा रहा है। अलग-अलग चेहरे, अलग-अलग चैनल—लेकिन लाइन वही। यही है “पप्पुओं की टोली” का मॉडल: एक स्क्रिप्ट, कई प्रस्तुतकर्ता।
इस टोली को किसी पार्टी-कार्ड से नहीं, बल्कि “टुकड़े-टुकड़े” वाली सोच से पहचान मिलती है। चेहरों और चैनलों के नाम बदल सकते हैं, पर नफरत, ज़हर और निष्कर्ष वही रहते हैं।

देश में जन्मे किसान देश को अनाज की फसले देते है। पर कुछ लोग उसी मिटटी से जन्मे विभाजन की फसल देते है। यहाँ बहस देश जोड़ने को नहीं, देश को टुकड़ों में देखने को उकसाती है—और यही इस गैंग की असली पहचान है।
टुकड़े-गैंग का चैनल, नाम ‘देशभक्त’ — यही सबसे बड़ा विरोधाभास ? जब किसी चैनल का नाम ‘देशभक्त’ हो, तो उम्मीद होती है कि वह देश जोड़ने की बात करेगा। देशभक्ति का मतलब देश को टुकड़ों में देखने की आदत नहीं। ‘देशभक्त’ कहलाने के लिए देश जोड़ने वाली बहस चाहिए—न कि हर मुद्दे को एक ही विभाजनकारी फ्रेम में ढालने की ज़िद।
कुछ साल पहले “भ्रष्टाचार-विरोधी आंदोलन की गंदगी से पैदा हुआ एक ‘देशभक्त’—इतिहास गवाह है। इतिहास यह भी दिखाता है कि हर बड़ा आंदोलन अपने साथ राजनीतिक अवसरवाद की परछाईं लाता है। वहीं से पैदा होती है वह गंदगी, जहाँ आदर्श पीछे छूटते हैं और नैरेटिव आगे बढ़ जाता है। इसी गंदगी से एक ‘देशभक्त’ ब्रांड का उभरना और बाद में टुकड़े-गैंग की संगत—यह संयोग नहीं, पैटर्न है।
“देश पर सवाल बेचकर कमाई, और उसी को बेचकर सुकून की कमाई? “यही टुकड़े-गैंग का कारोबार:-सवाल उठाना लोकतंत्र का अधिकार है, लेकिन जब हर सवाल बिकाऊ कंटेंट बन जाए और हर मुद्दा विभाजन की पैकेजिंग में परोसा जाए, तब यह आत्ममंथन नहीं, व्यापार बन जाता है। जो लोग देश को जोड़ने की जगह उसे टुकड़ों में देखने की आदत डालते हैं, वे आलोचक नहीं, कंटेंट-ट्रेडर बन जाते हैं।
टुकड़े-गैंग की सोच है—हर एक टॉपिक एक जैसा कैसे हो सकता है? जब हर मुद्दा—अर्थव्यवस्था, सुरक्षा, शिक्षा, विदेश नीति—एक ही फ्रेम में फिट किया जाए, तो सवाल उठता है: क्या सचमुच सब कुछ एक जैसा है, या जानबूझकर एक जैसा बनाया जा रहा है?यही पहचान है टुकड़े-गैंग की सोच की—जहाँ तथ्य नहीं, फ्रेम पहले तय होता है; और हर खबर उसी फ्रेम में ढाल दी जाती है। हर टॉपिक एक जैसा नहीं होता। अगर दिखाया जा रहा है कि है, तो यह संयोग नहीं—रणनीति है।
कठोर सच:
जो हर मुद्दे को एक ही रंग में रंग दे, वह जटिलता से डरता है। और जो जटिलता से डरे, वह जनता को आधा सच देता है। भ्रष्टाचार-विरोधी आंदोलन ने उम्मीद दी—यह उसकी ताक़त थी। लेकिन उसी आंदोलन की आड़ में पनपी नैरेटिव राजनीति उसकी कमजोरी बनी, जिसका फायदा टुकड़े-गैंग ने उठाया।
निष्कर्ष:
देश से सवाल पूछना गलत नहीं; सवालों को विभाजन का औज़ार बनाना गलत है। ‘देशभक्त’ कहलाने का हक़ नाम से नहीं, काम से मिलता है—और काम तब सार्थक होता है जब वह देश को जोड़ता है, टुकड़ों में नहीं बाँटता।
🧨 Gen-Z Awaz
यह ब्लॉग फैसला नहीं सुनाता, लेकिन एक स्पष्ट सवाल छोड़ता है—क्या निजी डर को बार-बार देश की कमजोरी बताना सही है, या यह भरोसे को धीरे-धीरे खोखला करने का तरीका बनता जा रहा है?
