Akhilesh Yadav’s Samajwadi Party becomes Namajvadi party:-पार्टी का तख़्ता: पहले बाप का अब बेटे का कब्ज़ा।

औरंगजेब की तरह पार्टी पर कब्ज़ा :-मुगलो के इतिहास की झलक में बाप और बेटे के बीच सत्ता को लेकर बहोत कत्लेआम हुए है। वैसे तो कत्लेआम इन जेहादियों और अक्रान्ताओ का सदीओ से पेशा रहा है पर हमारे यहाँ इनको मानने वाले कुछ राजनीतिज्ञ परिवारवादी इनको ही अपना वंसज समझते है। और ऐसी अक्रान्ताओ वाली सोच का नतीजा है अयोध्या में कारसेवको का कत्लेआम, लेकिन जिस मौलाना मुलायम का मन इससे न भरा हो और भी खून बहाने को अपना ताज समझता हो। ऐसी नमाजवादी पार्टी पर कब्ज़ा भी वैसे ही किया गया था जैसे औरंगजेब ने सत्ता पे कब्ज़ा किया था। सत्ता की लालसा ने परिवार के रिश्तों को दरकिनार कर दिया।
नमाजवादी पार्टी मौलानों का गढ़ :-इन नामजवादियो ने अपने आप को ऊपर से थोड़ा लाल और अंदर से पूरा हरा बना चुके है। इनकी पार्टी के कुछ प्रवक्ता तो ऐसे है जो हरा तोता बन के रहते है। अब तो इनकी आँखों को हरे रंग के आलावा कुछ दीखता ही नहीं।
आजम खान इस पार्टी का स्लीपर सेल था। और क्यों न हो जब पार्टी के अध्यक्ष का हाथ हो ऐसे बकरी चोर के ऊपर। जो अपने ही लोगो को निगल गया हो जिसके लिए बस इंसान चूस के फैकने वाले खिलौने होते है।
अतीक-मुख़्तार:जब पार्टी चली बंदूक की ताक़त से:-नमाजवादी पार्टी हमेशा बंदूक की ताक़त पर चलती थी। उत्तेर प्रदेश में इन लोगो ने लोकतंत्र को मौलानातंत्र बना दिया था। ये दोनों बाहुबली ही इस पार्टी की ताक़त थे। आज भी इनके नरक में जाने का दुःख इस टीपू को है। जनता की आवाज़ दबाई गई, विरोधियों को खदेड़ा गया और पार्टी का हर कदम केवल अतीक-मुख़्तार के दबदबे और निजी फ़ायदे के लिए उठाया गया। यह दौर केवल राजनीतिक खेल नहीं, बल्कि लोकतंत्र और संविधान के मूल्यों पर हमला था।
मिट्टी में तो मिलना ही था:- योगी जी के मॉडल में संदेश साफ़ है कि जो व्यवस्था को चुनौती देगा, वह कानून की कठोरता से बचेगा नहीं। यहाँ मिट्टी में मिलना तात्पर्य है। बहोतो को मिला दिया और ये कार्यकर्म जारी रहेगा जब तक यहाँ से गंदगी साफ़ न हो जाए। अतीक का पाकिस्तान और आईएसआई से कनेक्शन था। हमारा मानना है की नमाजवादी पार्टी ने ही अतीक को 4 दशक से अधिक समय तक बचाए रखा।
90 का दौर: शिक्षा और रोजगार में जातीय-धार्मिक प्रभाव:-90 का दौर शिक्षा और रोजगार में गहरे बदलावों का समय था, जहाँ नीतियों के साथ-साथ जातीय और धार्मिक प्रभाव भी निर्णायक भूमिका में दिखे। कई संस्थानों में योग्यता से अधिक पहचान और राजनीतिक संरक्षण की चर्चा आम हुई, जिससे प्रतिस्पर्धा और पारदर्शिता पर सवाल खड़े हुए। इस माहौल ने अवसरों के समान वितरण को प्रभावित किया और समाज में असंतोष बढ़ाया। परिणामस्वरूप, प्रतिभा का पलायन, संस्थागत विश्वास में कमी और मेरिट की बहस तेज़ हुई। यह दौर बताता है कि जब नीति-निर्माण में संतुलन और निष्पक्षता कमजोर पड़ती है, तो शिक्षा और रोजगार—दोनों की गुणवत्ता पर दीर्घकालिक असर पड़ता है।
