Hospital, वह जगह होती है जहाँ इंसान आख़िरी उम्मीद लेकर जाता है, लेकिन परिजनों के अनुसार, इलाज के बाद बिलिंग के समय कथित तौर पर बाउंसरों की मौजूदगी,डर, दबाव और पैसों की वसूली का केंद्र बन जाए, तो सवाल उठना लाज़मी है–हम बात कर रहे दिल्ली के एक बहोत बड़े नामी हॉस्पिटल का जिनके लिए ये बस एक सौदा या वसूली हो सकता है।
कैसा लगता होगा की किसी का अपना चला गया और वो हॉस्पिटल के बिलिंग काउंटर पे जाये या वो हॉस्पिटल के किसी भी एरिया में जाये पर हॉस्पिटल के बाउंसर आपको बिलकुल अकेला यही छोड़ेगे। अगर उन्हे अपनी डेड बॉडी को रिलीज़ करवाना है तो उन्हे पहले बाउंसर को सामना करना पड़ेगा और वो भी हथियारों के साथ, कुछ समय के लिए ऐसा लगता है है की जैसे आप किसी पार्टी का बिल दे रहे है।
डॉक्टर कम, बाउंसर ज़्यादा — क्या यही अस्पताल है?
अस्पतालों में जहाँ मरीजों को समय पर डॉक्टर, नर्स और ज़रूरी इलाज मिलना चाहिए, वहाँ आज एक डरावनी सच्चाई सामने आ रही है—डॉक्टरों की कमी है, लेकिन बाउंसरों की भरमार।
इंसानियत जब मर जाती है जब इन हॉस्पिटलों के नामो पे गौर करते है ऐसे नाम मनो जैसे संजीविनी बूटी इन्ही के पास है।
परिजनों के लिए ज्यादा फायदेमंद है अगर बाउंसर भी सफ़ेद कोट पहन कर अगर इलाज करे क्यों की आखिरी में तो इन्ही लोगो से ही फाइनल करना होता है।
किसी के लिए मृत शरीर, अस्पताल के लिए सिर्फ़ बेड नंबर।
किसी परिवार के लिए वह एक ज़िंदगी थी, एक रिश्ता था—लेकिन अस्पताल के लिए वह बस एक बेड नंबर बनकर रह गया। मौत के बाद, फ़ाइलें, बिल और औपचारिकताएँ सामने रख दी जाती हैं। जहाँ ऐसा लगता है की कोई अपने मरे हुए को नहीं, बल्कि कोई सामान ख़रीदने आया हो।
अक्सर परिजनों को आप रोते, गिड़गिड़ाते देख सकते हो क्योकि उस समय पर पता नहीं ऐसा लगता है जैसे मानो कसायिओं से किसी अपने को छुड़वा रहे है।
मृत शरीर या बंधक शव?
अस्पताल कभी-कभी ऐसा लगता है जैसे गुंडों की गैंग हो।और ये सब तब नहीं पता चलता जब तक खुद इस बुरे समय को नहीं देखा जाता।
डॉक्टर्स भगवान् का रूप माने जाते है और हमेशा माने जाएंगे लेकिन कुछ डॉक्टर्स और हॉस्पिटल जो इंसानियत भूल चुके है। जो इंसांन के शरीर के साथ खेलना पसंद करते है।
स्वास्थ्य सेवा का उद्देश्य जीवन बचाना है, न कि शोकग्रस्त परिवारों से आख़िरी पैसे तक वसूलना। अगर बिलिंग के लिए डर दिखाया जाए, तो यह व्यवस्था की नैतिक विफलता है। ऐसे मामलों की निष्पक्ष जाँच, पारदर्शी बिलिंग और सख़्त जवाबदेही ज़रूरी है—ताकि अस्पताल फिर से सेवा केंद्र बनें, वसूली अड्डा नहीं।
परिजन रोते है, हॉस्पिटल हंसता है।
एडमिशन के समय, उम्मीद के साथ अस्पताल आए परिवार का स्वागत होता है , लेकिन वही पे कुछ अनहोनी हनी के बाद गुंडागर्दी और धमकियाँ हावी रहती हैं। बिलिंग और औपचारिकताओं के नाम पर मरीज और परिजन डरे हुए होते हैं, जैसे इलाज नहीं बल्कि डर का खेल चल रहा हो। डॉक्टर्स और स्टाफ़ मौजूद होते हैं, लेकिन इंसानियत कहीं गायब हो जाती है। इस जगह पर स्वागत नहीं, बल्कि धमकी और दबाव का माहौल है—जहाँ परिवार अपने अपनों की जान और इलाज दोनों के लिए मजबूर होता है।
