Bengal-mamata-banerjee-refuses-sir-form:- रोहिंग्या बनर्जी बन जाएँगे या वे खुद रोहिंग्या बन जाएँगे?

रोहिंग्या मूल रूप से म्यांमार के जिहादी समुदाय से हैं और इनका काम दूसरे देशों में घुसकर वहाँ की डेमोग्राफी, अर्थव्यवस्था और चुनावों में भी अपनी पैठ बनाना है। इनके लिए TMC एक तरह से ऑक्सीजन का काम करती है, जबकि बाकी सारी देश की राजनीतिक पार्टियाँ इनके ऑक्सीजन सिलेंडर को रीफिल करने का काम करती हैं।
आलोचकों का कहना है कि इनके लिए भारत‑बांग्लादेश की सीमा जैसे कोई मायने नहीं रखती। आरोप लगाया जाता है कि रोहिंग्या यहाँ आकर पहचान बदल लेते हैं और राज्य सरकार की नीतियाँ इस पर सख़्ती नहीं दिखातीं। मतदाता पहचान जैसे दस्तावेज़ों को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं। इसके बाद राजनीतिक बयानबाज़ी में सारा निशाना भाजपा पर साधा जाता है, जबकि असल मुद्दों पर जवाबदेही तय नहीं होती।
रोहिंग्या के हमदर्द।
आलोचकों का कहना है कि रोहिंग्या शरणार्थियों को भारत में रहने को लेकर ज़्यादा चिंता करने की ज़रूरत नहीं पड़ती, क्योंकि उनके आने से पहले ही उनके कथित समर्थक कई तरह की व्यवस्थाएँ कर देते हैं। यह भी आरोप लगाए जाते हैं कि अलग‑अलग राज्यों में उनके हमदर्द मौजूद हैं। कुछ लोग मानते हैं कि यही नेटवर्क देशभक्त नागरिकों के ख़िलाफ़ एक समानांतर दबाव समूह की तरह काम करता है, जिसका उल्लेख पूर्व सीडीएस जनरल बिपिन रावत ने भी अपने बयानों में किया था।
Gen Z पूछ रही है: पारदर्शिता से दिक्कत किसे है?
लोकतंत्र का इससे बड़ा मज़ाक और क्या होगा कि कुछ बड़े नेता वर्षों से वोट लेकर मुख्यमंत्री बने हुए हैं, लेकिन आज भी उन्हें देश की EVM और मतदाताओं पर शक है। सवाल तब और गहरा हो जाता है, जब उन्हीं पर यह आरोप लगते हैं कि उनके अपने कथित समर्थक सीमा पार से लाए जाते हैं और चुनावी राजनीति में इस्तेमाल किए जाते हैं। एक तरफ़ व्यवस्था पर अविश्वास जताया जाता है, दूसरी तरफ़ उसी व्यवस्था से सत्ता भी हासिल की जाती है। ऐसे दोहरे मानदंड लोकतंत्र की जड़ों को कमजोर करते हैं।
Political party Opposing SIR:- पारदर्शिता से डर या सियासी मजबूरी?
SIR से भागना दरअसल सिस्टम से नहीं, सत्ता से जुड़ा हुआ है, और इन नेताओं के लिए शायद सत्ता देश से भी ऊपर हो चुकी है। पिछले दस वर्षों से लगातार विरोध करते‑करते इन्होंने जनता का भरोसा भी खो दिया है। आज जो इनके साथ भीड़ दिखाई देती है, वह जनसमर्थन कम और सत्ता की लालसा ज़्यादा लगती है। आरोप यह हैं कि कुछ लोग किसी भी तरह देश से सौदेबाज़ी करके सिर्फ़ कुर्सी तक पहुँचना चाहते हैं। ऐसे रवैये ने राजनीति को सेवा नहीं, बल्कि स्वार्थ का माध्यम बना दिया है।
जब सारी राजनीतिक पार्टियाँ एक साथ SIR के ख़िलाफ़ खड़ी हों:-
हमारे देश के महान चाणक्य ने कहा था कि जब सारे विरोधी एक स्वर में बोलने लगें, तो समझ लेना चाहिए कि शासक ईमानदार है। 2014 के बाद अक्सर यह देखने को मिला है कि अलग‑अलग राजनीतिक पार्टियाँ किस तरह एक साथ खड़ी होकर हर मुद्दे पर हंगामा करती नज़र आती हैं—चाहे वह संसद हो, चुनाव हों या देशहित से जुड़े किसी भी निर्णय की बात हो। आलोचकों का मानना है कि रचनात्मक बहस की जगह कई बार अवरोध और अराजकता को प्राथमिकता दी जाती है, जिससे लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं की गरिमा प्रभावित होती है।
