Dhruv Rathee bihar election:- स्कैम’ बोलकर बिहारीयों पर वार
बिहार की जटिल सामाजिक और आर्थिक सच्चाइयों को केवल 10 मिनट की भ्रामक प्रचार वीडियो में समेट देना समस्या को समझाना नहीं, बल्कि कुछ मिलियन व्यूज़ और सब्सक्रिप्शन के लिए अपने ही राष्ट्र के सिद्धांतों की सौदेबाज़ी करना है। ऐसे लोग वही दिखाते हैं जो उनके लिए सुविधाजनक हो। लगता है उन्होंने कभी बिहार को नक्शे से बाहर जाकर देखा ही नहीं—अनुभव ऐसा पेश किया जाता है मानो जर्मनी ही दरभंगा में बसता हो।हर भ्रामक वीडियो में देश के मतदाताओं का अपमान करना, उन्हें बार–बार मूर्ख साबित करने की कोशिश करना—यह सब पिछले दस सालों से चल रहा है। लेकिन अब इसकी इतनी ज़रूरत क्यों पड़ गई? शायद इसलिए कि जब ज़मीनी स्तर पर कुछ खास हासिल नहीं हो पाया, तो दूर बैठकर उपदेश देना ही सबसे आसान रास्ता बचा।
अच्छे कपड़े पहनकर, स्टाइल से हाथ हिलाकर, HD कैमरा और भारी एडिटिंग के सहारे हज़ारों वीडियो बनाए जाते हैं। करोड़ों अंध–समर्थकों के सामने जो भी “विश्लेषण” परोसा जाता है, उसमें हर बार निशाना एक ही होता है। इससे साफ़ है कि समस्या वहाँ नहीं है—समस्या इन वीडियो की सोच और नीयत में है।
Dhruv Rathee,“जर्मन भक्त पुकार रहा है।“जर्मन भक्त” पुकार रहा है—इसकी इतनी मधुर और देशभक्ति में लिपटी आवाज़ सुनकर ऐसा लगता है मानो कोई नेता जर्मनी से बोल रहा हो: “तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा।”लेकिन इसे यह भी सोचना चाहिए कि इसकी इन बातों का असर करोड़ों लोगों पर पड़ता है।
हालाँकि, अपने ही देश के साथ ऐसा व्यवहार हज़ारों सालों से होता आया है—नया कुछ भी नहीं।
हर बार यही कहना कि “मुझे कोई पैसा नहीं देता”, कभी-कभी शक पैदा कर देता है।कहीं इसका मतलब यह तो नहीं कि पैसे कम मिल रहे हैं?और अगर कहीं ज़्यादा मिल जाएँ, तो यूट्यूब को ही “झूठट्यूब” बनाने में देर नहीं लगेगी।देशभक्ति के नाम पर मीठी भाषा, भारी भावनाएँ और ऊँची आवाज़—लेकिन जब सच्चाई पीछे छूट जाए, तो सवाल उठना स्वाभाविक है।
Dhruv Rathee की “स्पेशल ट्रेन”—बिहार चुनाव से जुड़ी उनकी वीडियो देखकर ऐसा लगता है मानो देश में पहली बार कोई ट्रेन चली हो। और हैरानी की बात यह कि कई लोग ऐसे भी हैं, जिन्होंने ट्रेन का नाम पहली बार इन्हीं के मुँह से सुना हो।इतनी “बड़ी खबर” देखने के बाद मन तो करता है कि सरकार एक ट्रेन जर्मनी के लिए भी चला दे—बस।हकीकत यह है कि सिर्फ़ बिहार ही नहीं, किसी भी राज्य में जब बड़े त्योहार आते हैं, तो सरकार स्पेशल ट्रेनें चलाती है। खास तौर पर बिहार के लिए यह व्यवस्था सालों से होती आ रही है।लेकिन यहाँ मुद्दा ट्रेन का नहीं, उसे पेश करने के तरीके का है। अपने उद्देश्य के हिसाब से साधारण व्यवस्था को असाधारण बनाकर दिखाया जाता है—मानो वही अकेली सच्चाई हो।
ट्रेन तो सिर्फ़ ट्रेन है,
लेकिन जब नैरेटिव चाहिए,
तो वही ट्रेन “वो वाली ट्रेन” बन जाती है।
क्या ज़्यादा महत्वपूर्ण है—भारत की छवि या खुद की फ्रेमिंग?इनका देशप्रेम देखकर कभी-कभी ऐसा लगता है मानो अपनी छवि को देश से भी बड़ा दिखाने की कोशिश हो रही हो।
आज यह याद दिलाना ज़रूरी है कि देश किसी एक व्यक्ति की राय से नहीं, बल्कि मज़बूत संस्थाओं, लोकतांत्रिक व्यवस्था और राष्ट्रभक्ति से चलता है।
बिहार के बारे में दिखाई गई “गजब की नॉलेज” भी सवाल खड़े करती है।हज़ारों किलोमीटर दूर बैठकर, करोड़ों लोगों के वोट का एक-एक हिसाब लगाना—हर व्यक्ति के वोट की वैल्यू तय करना—यह ज्ञान कम और दावे ज़्यादा लगते हैं।इतनी दूरी से इतनी सटीकता दिखाना सच में हैरान करता है।
कहा जाता है—कोई पार्टी पसंद नहीं, राजनीति पसंद नहीं, बिहार पसंद नहीं, भारत पसंद नहीं, मोदी पसंद नहीं, योगी पसंद नहीं।लेकिन बिहार की बात आते ही किसी खास दल के पक्ष में उत्साह दिखता है—कभी “स्वराज” का जिक्र, कभी राष्ट्रीय जनता दल की पैरवी,कभी लालू यादव और उनके परिवार के समर्थन में नरमी।
आधे तथ्य, पूरा प्रभाव,
भारत में एक ऐसा वर्ग भी है जो हमेशा आधे-अधूरे सत्य की तलाश में रहता है।
उन्हें पूरे सच से कोई सरोकार नहीं—क्योंकि पूरा सच नैरेटिव को असहज बना देता है।
ऐसे लोगों को न किसी ब्लॉग से बदला जा सकता है, न 20 मिनट के वीडियो से।
इनकी संख्या करोड़ों में है, इसलिए सब्सक्राइबर की कभी कमी नहीं होती—और न ही होगी।
अब तरीका सीधा है—खुद की स्किल्स सुधारो, बोलने का ढंग आकर्षक बनाओ,
दो-चार भ्रामक फुटेज जोड़ो और इतना झूठ परोस दो कि देखने वालों की आँखों पर पर्दा पड़ जाए।
जब आधा सच बार-बार दिखाया जाता है,तो वही पूरा सच लगने लगता है—और यही सबसे खतरनाक प्रभाव होता है।
आलोचना के नाम पर प्रधान बनकर दिशा-निर्देशन करना
अब यह समझाना मुश्किल होता जा रहा है कि लगातार आलोचना करते-करते कोई खुद को देश का मार्गदर्शक मानने लगे, तो वह लोकतंत्र की भावना के खिलाफ़ चला जाता है।
केवल विरोध करना नेतृत्व नहीं होता—और न ही हार-जीत की लंबी श्रृंखला किसी को देश का चौधरी बना देती है।
दूर बैठकर, अकेले वीडियो बनाकर पूरे देश को एक साथ दिशा देना संभव नहीं है।
अगर ऐसा होता, तो यहाँ इससे कहीं बड़े-बड़े आलोचक पहले ही देश को बदल चुके होते—जो बोलते ज़्यादा हैं, करते कम।
चिंता तब बढ़ती है जब ऐसे कंटेंट का सबसे बड़ा दर्शक वर्ग युवा हो।जब युवाओं के सामने किसी एक आवाज़ को “मसीहा” की तरह पेश किया जाता है,तो लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी बजती है।
पूरे राज्यों और मतदाताओं पर संदेह पैदा करना जागरूकता नहीं, अविश्वास फैलाना है।
आलोचना करें—कौन मना करता है।लेकिन यह कैसे संभव है कि हर मुद्दे पर विरोध के लिए सिर्फ़ एक ही पक्ष दिखाई दे?अगर हर जगह वही दिख रहा है, तो सवाल मुद्दों पर नहीं, दृष्टि पर उठता है।
आलोचना का अधिकार है—दिशा-निर्देशन का ठेका नहीं।
Gen Z आवाज़ | पहला पोस्ट
यह आवाज़ उन सभी Gen Z युवाओं और हर उस देशवासी के लिए है, जो खुद को Gen Z की सोच से जोड़कर देखता हैऔर राष्ट्र को हमेशा प्रथम मानता है।
हम किसी के खिलाफ़ नहीं, हम देश के पक्ष में खड़े हैं। हम सीखना चाहते हैं, समझना चाहते हैं और आप सबके साथ मिलकर वैसी ही राष्ट्रभक्ति जीना चाहते हैं जो शब्दों में नहीं, सोच और कर्म में दिखाई दे।
यह शुरुआत है—
नैरेटिव से बाहर निकलने की, सच देखने की,और राष्ट्र प्रथम की सोच को आगे बढ़ाने की।
Gen Z बोलेगा। सोचकर बोलेगा। देश के लिए बोलेगा।
